रायगढ़ मुनादी।। देशभर में चल रही जनगणना और सर्वे प्रक्रिया के बीच अब एक नया विवाद खड़ा होता दिख रहा है। फील्ड में काम कर रहे शिक्षकों और उच्च अधिकारियों के बीच तनातनी की खबरें सामने आ रही हैं। आरोप है कि जमीनी स्तर पर जुटाई गई जानकारी को ऑफिस में “दुरुस्त” कराने का दबाव बनाया जा रहा है।
मामला खास तौर पर शौचालय संबंधी जानकारी को लेकर गरमाया हुआ है। कई गांवों में लोगों ने सर्वे कर रहे शिक्षकों को साफ बताया कि उनके घरों में अब भी शौचालय नहीं है। शिक्षकों ने दावा किया कि उन्होंने वही जानकारी फॉर्म में दर्ज की, जो मौके पर मिली। लेकिन जब यह डेटा उच्च अधिकारियों के पास पहुंचा, तो कथित तौर पर उसे बदलने का दबाव शुरू हो गया।
शिक्षकों का आरोप है कि अधिकारियों द्वारा कहा जा रहा है कि जिन घरों में शौचालय नहीं है, वहां भी “हाँ” भर दिया जाए। वजह? पूरा जिला पहले ही ODF यानी Open Defecation Free घोषित किया जा चुका है। ऐसे में अगर बड़ी संख्या में शौचालय न होने की जानकारी ऊपर भेजी गई, तो सरकारी दावों पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
इसी मुद्दे को लेकर कई जगहों पर विवाद और टकराव की स्थिति बन रही है।
छाल में बढ़ा विवाद
रायगढ़ जिले के छाल इलाके में यह विवाद खुलकर सामने आ गया। बताया जाता है कि एक शिक्षक ने व्हाट्सएप ग्रुप में नाराज़गी जाहिर करते हुए लिख दिया कि अगर सारी जानकारी ऑफिस में बैठकर ही बदलनी है, तो फिर कर्मचारियों को गांव-गांव भटकाने की जरूरत ही क्या थी। उसने तंज कसते हुए लिखा कि “जब सब कुछ ऑफिस में ही भरना है, तो पूरा काम वहीं कर लिया जाता।”
इस टिप्पणी के बाद मामला और गर्मा गया। सूत्रों के मुताबिक छाल तहसीलदार ने पहले शिक्षक को फोन पर समझाने की कोशिश की, लेकिन जब वह अपने बयान पर कायम रहा, तो उसे शो-कॉज नोटिस जारी कर दिया गया।
“डेटा नहीं, मनमाफिक रिपोर्ट चाहिए?”
एक अन्य शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर मुनादी से कहा कि कई अधिकारी वास्तविक जानकारी लेने के बजाय “सिस्टम के मुताबिक” डेटा भरवाना चाहते हैं। शिक्षक का आरोप है कि जो कर्मचारी ऐसा करने से मना करते हैं, उन्हें प्रताड़ित किया जाता है या दबाव बनाया जाता है।
हालांकि प्रताड़ना के आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन छाल की घटना ने यह साफ कर दिया है कि फील्ड में जुटाई गई जानकारी और ऑफिस में तैयार हो रही रिपोर्ट के बीच सब कुछ सामान्य नहीं है।
बड़ा सवाल
अगर जमीनी हकीकत और सरकारी रिकॉर्ड में फर्क है, तो सही कौन है?
वो शिक्षक जो गांव-गांव घूमकर जानकारी जुटा रहे हैं…
या वो सिस्टम जो पहले से घोषित उपलब्धियों को बचाने में लगा है?
जनगणना जैसे गंभीर काम में यदि आंकड़ों को “फिट” करने की कोशिश हो रही है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विवाद नहीं, बल्कि सरकारी डेटा की विश्वसनीयता पर भी बड़ा सवाल है।