सरगुजा मुनादी। साल था 1912-13 का। पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध जंग छिडी हुई थी। अंग्रेज अपनी जेबें भरने के लिए किसान, छोटे व्यापारी, मजदूरों पर नजायज कर थोप रहे थे। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसका विरोध हो रहा था। इसी बीच छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के कुसुमी ब्लॉक में तीन दोस्तों ने इस असंगत करारोपण के विरूद्ध शंखनाद किया। इन वीर सपूतों के हौसलों से अंग्रेज सरकार इस कदर घबराई कि उनके आंदोलन को दबाने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया।

मुनादी डॉट कॉम आपको लगातार ऐसे आजादी के दीवानों के बारे में बता रही है जिन्हें इतिहास से गायब कर दिया गया। ऐसे ही तीन आजादी के दीवानों की कहानी, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेते हुए अपना बलिदान दे दिया। जैसा कि उपर हमनें बताया कि बात 1912-13 की है। अंग्रेजी हुकूमत के बढ़ते अत्याचार के कारण छत्तीसगढ़ के आदिवासियों में भी विद्रोह की ज्वाला पनप रही थी। इसे हवा देने आगे आए तीन दोस्त। लागूड़, बिगुड़ और थिथीर उरांव। लागूड़ नगेसिया समुदाय से थे। बिगुड़ बनिया और थिथीर उरांव समाज से। तीनों ने मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलनकारी दस्ता बनाया और काम पर लग गए। अंग्रेजों के एजेंट राजा और उनके समर्थकों को मारने लगे। अंग्रेज सरकार तक यह बात पहुंची तो वे घबरा गए। इस आंदोलन को दबाने के लिए उन्होंने सरगुजा के तत्कालीन राजा को आदेष दिए। राजा ने अपने आकाओं के कहने पर आदिवासियों के इस छोटे से आंदोलनकारी समूह पर धावा बोल दिया। लेकिन आदिवासियों के समूह ने बड़ी बहादुरी से लड़कर राजा की सेना को लगभग हरा दिया। इससे दुखी राजा ने अंग्रेजों से मदद मांगी। ब्रिटिश सेना ने अपने घुड़सवार दस्ते को आंदोलनकारियों को मारने के लिए भेजा। हक के लिए लड़ रहे क्रांतिकारी और हुकूमत के बीच जंग हुई। हथियारों की कमी और संख्याबल के कारण आंदोलनकारियों को हार का सामना करना पड़ा। थिथीर उरांव को ब्रिटिश आर्मी ने मौके पर ही मार दिया।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लागुड़ और बिगुड़ को राजा के हवाले कर दिया। राजा ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए दोनों को गर्म तेल के खौलते हुए कड़ाई में डाल दिया। नतीजतन उनकी मौत हो गई। राजा ने सोचा कि इसके बाद आंदोलन खत्म हो जाएगा। लेकिन इसका असर उल्टा हुआ। आंदोलन और तेज हुआ पूरे देष भर से क्रांतिकारी आगे आने लगे। आखिरकार ब्रिटिश गर्वमेंट को हार माननी पड़ी और देश छोड़ना पड़ा।
108 साल बाद मिला न्याय
खौलते तेल में आजादी के दीवानों को मरने के लिए छोड़ने के बाद उनकी अस्थियां ही बची थी। जिसे राजा ने पहले तो अपने महल में प्रदर्शनी के तौर पर रखा ताकि कोई भी साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ा होने से पहले सौ बार सोचे। इसके बाद अस्थियों को स्कूल में बच्चों के पढ़ाई के नाम पर रखवा दिया गया। नगेसिया समाज ने लगातार कई आंदोलन किए। जिसके बाद उन्हें न्याय मिल पाया। 108 सालों के लंबे संघर्ष के बाद फरवरी 2022 में अस्थियों का दाह संस्कार किया गया।
इतिहास में कहीं नाम नहीं
अंग्रेजी हुकूमत से लड़ने वाले कई ऐसे सपूत है। जिन्होंने साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ाई में खुद को बलिदान कर दिया। लेकिन आज उनका इतिहास में नाम नहीं है। ना भारत सरकार की गजेटियर में और ना ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में। सरकार ने लगभग उनकों भुला दिया था। लेकिन समाज के लोगों ने उनके बलिदान को नहीं भुलाया। सरगुजा माटी में आज भी वीर सपूतों की कहानी की महक है। लोक परंपराओं में उनके वीरता की गाथाएं गायीं जाती है।
दोस्ती हर बार देश के लिए काम आई
भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव। रामप्रसाद बिस्मिल, असफाक उल्लाहखान। इन नामों को देश में ना जानने वाला कोई व्यक्ति नहीं है। इनके सर्वोच्च बलिदान के कारण ही आज हम आजाद हवा में सांस ले पा रहे है। इनकी भी दोस्ती की मिशालें दी जाती हैं। इनकी दोस्ती ने अंग्रेजी सरकार को चुनौती दी और पूरे देश में आंदोलन को मजबूत किया। अंत में हंसते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए। मुनादी डॉट कॉम आपसे यही आग्रह करता है कि देष की आजादी या सामा्रज्यवाद के खिलाफ जो कोई भी उठकर लड़ा। इन्हें याद रखें। सरकार की तरह हम इन्हें ना भूले। इनके बलिदान को व्यर्थ ना जाने दिया जाए। इन्हें दी जाने वाली सच्ची श्रद्धांजलि यही है।
नोट- समाचार में लिखे गए फैक्ट्स विभिन्न अखबारों में प्रकाशित खबरों और क्रांतिकारियों के बारे में लिखी गई पुस्तकों से ली गई है।