आठ प्रतिशत की रफ्तार में आम आदमी कहाँ है?कारों की रिकॉर्ड बिक्री और चमकते आर्थिक आंकड़ों के बीच बेरोजगारी, कर्ज और कुपोषण के सवाल, पढ़िए पूरा विश्लेषण

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September 05, 2026



आठ प्रतिशत की रफ्तार में आम आदमी कहाँ है?कारों की रिकॉर्ड बिक्री और चमकते आर्थिक आंकड़ों के बीच बेरोजगारी, कर्ज और कुपोषण के सवाल, पढ़िए पूरा विश्लेषण

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डॉ. नरेन्द्र कुमार पर्वत (व्याख्याता) की मुनादी ।। भारत की अर्थव्यवस्था करीब आठ प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में यह सबसे तेज वृद्धि दरों में है। सरकार के लिए यह उपलब्धि है और देश के लिए भी गर्व का विषय होना चाहिए। लेकिन आर्थिक विकास का अर्थ केवल GDP की ऊंची दर नहीं है। उसकी असली परीक्षा नागरिक की आय, रोजगार और जीवन की सुरक्षा में होती है।

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*यहीं एक सीधा सवाल खड़ा होता है—इस आठ प्रतिशत की वृद्धि में आम आदमी कहाँ है?*

हाल में यात्री वाहनों की रिकॉर्ड बिक्री को बढ़ती क्रय शक्ति का संकेत माना गया। यह अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। ग्रामीण बाजार भी अब वाहन मांग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। लेकिन कारों की बिक्री को देश की व्यापक समृद्धि का पैमाना नहीं बनाया जा सकता। जिस परिवार की आय का बड़ा हिस्सा भोजन, मकान, शिक्षा और इलाज में चला जाता है, उसके लिए कार अभी भी उपभोग की प्राथमिकता नहीं है।

इसलिए असली सवाल कारों का नहीं, आय के वितरण और क्रय शक्ति का है।

*GDP बढ़ी, जेब कितनी भरी?*

GDP देश में पैदा हुई वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को मापती है। लेकिन वह यह नहीं बताती कि उससे पैदा हुई आय किसके हिस्से में गई।

बड़े उद्योगों का उत्पादन और मुनाफा बढ़ सकता है, सेवाओं का विस्तार हो सकता है और बाजार में महंगे उत्पादों की मांग बढ़ सकती है। इससे GDP तेज हो सकती है। मगर उसी समय किसी बेरोजगार युवा की आय शून्य रह सकती है और कम आय वाले परिवार की वास्तविक क्रय शक्ति महंगाई से दब सकती है।

इसीलिए GDP Growth को Household Welfare का पर्याय मानना भूल होगी।

भारत के लिए अब केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; उत्पादन से रोजगार और रोजगार से पर्याप्त आय पैदा करना जरूरी है।

*युवा आबादी - अवसर या बेचैनी?*

भारत की युवा आबादी को demographic dividend कहा जाता है। लेकिन यह लाभ तभी मिलेगा जब शिक्षा और कौशल रोजगार में बदलें।

PLFS 2025 के अनुसार 15-29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत थी। शहरी युवाओं में यह 13.6 प्रतिशत रही। समस्या केवल नौकरी न मिलने की नहीं है। बड़ी संख्या में युवा कम वेतन, अस्थायी और असुरक्षित काम में भी हैं।

डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ता अंतर सामाजिक बेचैनी को जन्म देता है। वर्षों तैयारी करने के बाद नौकरी न मिलना केवल व्यक्तिगत निराशा नहीं यह परिवार की बचत, समय और भविष्य की योजनाओं पर भी असर डालता है।

भारत को रोजगार के आंकड़े बढ़ाने से आगे बढ़कर सम्मानजनक और टिकाऊ रोजगार पैदा करने होंगे।

*चीन और अमेरिका से तुलना का दूसरा पहलू-*

भारत की विकास दर चीन से अधिक होना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि भारत आर्थिक रूप से चीन से आगे निकल गया है।

विश्व बैंक के 2025 के आंकड़ों के अनुसार भारत की प्रति व्यक्ति GDP करीब 2,700 डॉलर, चीन की करीब 13,800 डॉलर और अमेरिका की लगभग 90,000 डॉलर थी।

यह अंतर बताता है कि भारत अभी आय के स्तर पर बहुत पीछे है। चीन ने लंबे समय तक विनिर्माण और निर्यात के जरिए बड़े पैमाने पर रोजगार और आय पैदा की। भारत को भी सेवा क्षेत्र की ताकत के साथ ऐसे उद्योगों का विस्तार करना होगा जो बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार दें।

तेज वृद्धि जरूरी है, लेकिन उसकी सामाजिक पहुंच उससे भी जरूरी है।

*कर्ज आज का, ब्याज कल का-*

सरकारी कर्ज विकास का दुश्मन नहीं है। बुनियादी ढांचे और उत्पादक निवेश के लिए लिया गया कर्ज भविष्य की क्षमता बढ़ा सकता है। समस्या तब है जब कर्ज बढ़े, लेकिन उसके अनुपात में उत्पादन और रोजगार न बढ़ें।

2026-27 में केंद्र का debt-to-GDP ratio लगभग 55.6 प्रतिशत और राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 4.3 प्रतिशत रखा गया है। इसलिए सरकार के सामने विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बनी हुई है।

कर्ज का मूल्यांकन केवल उसकी मात्रा से नहीं, उससे पैदा होने वाली भविष्य की आय से होना चाहिए।

*कारों की चमक के पीछे कुपोषण -*

भारत की आर्थिक तस्वीर का सबसे गंभीर विरोधाभास पोषण के क्षेत्र में दिखाई देता है। 2025 Global Hunger Index में भारत "serious" श्रेणी में रहा। बच्चों में stunting और wasting की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।

एक ओर महंगी कारों और उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री बढ़ रही है; दूसरी ओर कुछ बच्चों को पर्याप्त पौष्टिक भोजन नहीं मिल रहा। इसे विरोधाभास कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। यह बताता है कि बाजार की समृद्धि और सामाजिक कल्याण एक ही गति से नहीं बढ़ रहे।

किसी बच्चे का कुपोषण केवल स्वास्थ्य की समस्या नहीं, भविष्य की उत्पादकता का नुकसान भी है।

*Freebies नहीं, अवसर चाहिए -*

गरीब को भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा देना राज्य की जिम्मेदारी है। इसलिए हर कल्याणकारी योजना को मुफ्तखोरी कहना उचित नहीं।

लेकिन सहायता और स्थायी निर्भरता में फर्क है।

मुफ्त राशन भूख से बचा सकता है लेकिन रोजगार परिवार को आत्मनिर्भर बनाता है। छात्रवृत्ति शिक्षा का रास्ता खोल सकती है; कौशल और apprenticeship रोजगार तक पहुंचाते हैं। किसान सहायता राहत दे सकती है बेहतर उत्पादकता और बाजार स्थायी आय देते हैं।


इसलिए कल्याणकारी नीति का लक्ष्य होना चाहिए—

*सहायता से अवसर और अवसर से आत्मनिर्भरता*


*GDP के आंकड़े और पारदर्शिता-*


नई GDP श्रृंखला में आधार वर्ष 2022-23 किया गया है और गणना पद्धति में बदलाव हुए हैं। सरकार के अनुसार इससे अर्थव्यवस्था की मौजूदा संरचना का बेहतर आकलन संभव होगा। कुछ विशेषज्ञों ने पद्धति, deflator और संशोधनों को लेकर सवाल उठाए हैं।

इन सवालों का उत्तर राजनीतिक आरोपों से नहीं, पारदर्शी आंकड़ों और स्वतंत्र समीक्षा से दिया जाना चाहिए।

GDP को फर्जी बताने के लिए प्रमाण चाहिए; लेकिन GDP पर सवाल पूछने के लिए लोकतंत्र में किसी अनुमति की जरूरत नहीं।

विश्वसनीय आंकड़े ही विश्वसनीय विकास-कथा का आधार हैं।

अब विकास की कसौटी बदलनी होगी

भारत को तेज आर्थिक वृद्धि चाहिए और उसे बनाए रखना भी होगा। लेकिन अगला लक्ष्य केवल GDP की ऊंची दर नहीं हो सकता।

विकास का मूल्यांकन यह देखकर होना चाहिए कि —

कितने रोजगार बने?

वास्तविक मजदूरी कितनी बढ़ी?

परिवारों की बचत और आर्थिक सुरक्षा कितनी मजबूत हुई?

बच्चों का पोषण कितना सुधरा?

आय का लाभ निचले और मध्य वर्ग तक कितना पहुंचा?

यही वे प्रश्न हैं जो GDP की चमक के पीछे छूट जाते हैं।

भारत की आर्थिक वृद्धि स्वागत योग्य है। कारों की रिकॉर्ड बिक्री भी अच्छी खबर है। लेकिन किसी देश की समृद्धि का प्रमाण केवल यह नहीं कि कितने लोग नई कार खरीद सकते हैं।

असली प्रमाण यह है कि कितने लोग अपने बच्चों की पढ़ाई, इलाज, रोजगार और बुढ़ापे को लेकर आश्वस्त हैं।

भारत को केवल तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं बनना है।उसे ऐसी अर्थव्यवस्था बनना है जिसमें विकास ऊपर दिखाई ही नहीं दे, नीचे महसूस भी हो।

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आखिर सवाल GDP का नहीं, विकास के लाभार्थी का है और वह सवाल आज भी सामने है आठ प्रतिशत की रफ्तार में आम आदमी कहाँ है ?


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