सतीश शर्मा की मुनादी ।। जापान के आइची-नागोया में 19 सितंबर से 4 अक्टूबर तक आयोजित 20वें एशियाई खेलों में भारत ने 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य सहित कुल 85 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। पदकों की संख्या भले ही 2023 के हांगझोउ एशियाई खेलों के 106 से कम रही, लेकिन यह भारत के एशियाई खेलों के इतिहास का दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।


पदक तालिका में शीर्ष पर रहने वाले चीन ने भारत से कहीं अधिक 169 स्वर्ण, 89 रजत और 83 कांस्य सहित कुल 341 पदक जीते। चीन की विशाल पदक संख्या एशियाई खेलों में उसके दबदबे को दर्शाती है, जबकि भारत का चौथा स्थान यह बताता है कि वह महाद्वीप की प्रमुख खेल शक्तियों में अपनी जगह बनाए हुए है।
छोटा दल, फिर भी चौथा स्थान
हांगझोउ और आइची-नागोया के प्रदर्शन की तुलना करते समय दल के आकार को ध्यान में रखना जरूरी है। 2023 में भारत ने 655 खिलाड़ियों का दल भेजा था, जिसने 40 खेलों में हिस्सा लिया था। इस बार 501 खिलाड़ियों ने 36 खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
हांगझोउ में भारत ने 28 स्वर्ण, 38 रजत और 40 कांस्य सहित 106 पदक जीते थे। नागोया में यह आंकड़ा 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य यानी कुल 85 पदक रहा। यानी भारत ने पिछले संस्करण की तुलना में सात स्वर्ण, 11 रजत और तीन कांस्य पदक कम जीते।
इसके बावजूद दोनों संस्करणों में भारत चौथे स्थान पर रहा। छोटे दल और कम खेलों में भागीदारी के बावजूद चौथा स्थान हासिल करना भारतीय खेलों के लिए सकारात्मक संकेत है। हालांकि, यह भी सच है कि हांगझोउ में जिन खेलों से बड़ी संख्या में स्वर्ण मिले थे, उनमें इस बार प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा।
हांगझोउ के 28 स्वर्ण में से 20 स्वर्ण भारत इस बार बरकरार नहीं रख सका। निशानेबाजी के सभी सात और एथलेटिक्स के सभी छह स्वर्ण हाथ से निकल गए। व्यक्तिगत स्पर्धाओं में गिरावट अधिक स्पष्ट रही। इसके विपरीत टीम, रिले और मिश्रित स्पर्धाओं ने इस बार भारत के स्वर्ण पदकों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
एथलेटिक्स: उम्मीदों से कम, उपलब्धियां फिर भी बड़ी
भारत की 74 सदस्यीय एथलेटिक्स टीम हांगझोउ के 29 पदकों के प्रदर्शन को दोहरा नहीं सकी। नागोया में एथलेटिक्स से 24 पदक मिले—एक स्वर्ण, नौ रजत और 14 कांस्य।
हांगझोउ में भारत ने एथलेटिक्स में छह स्वर्ण पदक जीते थे। नीरज चोपड़ा, तजिंदरपाल सिंह तूर, पारुल चौधरी और अविनाश साबले जैसे खिलाड़ियों ने व्यक्तिगत स्पर्धाओं में स्वर्ण दिलाए थे। नागोया में यह तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भारत का एकमात्र एथलेटिक्स स्वर्ण महिला 4×400 मीटर रिले में आया।
किरण पहल, एम. पूवम्मा, प्राची चौधरी और विथ्या रामराज की चौकड़ी ने स्वर्ण जीतकर भारतीय एथलेटिक्स की प्रतिष्ठा बचाई।
गुलवीर सिंह और विथ्या रामराज इस अभियान के प्रमुख सितारों में रहे। गुलवीर ने 10,000 मीटर, 5,000 मीटर और 1,500 मीटर में तीन पदक जीतकर एक ही एशियाई खेलों में तीन पदक जीतने वाले भारतीय एथलीट के रूप में विशेष उपलब्धि हासिल की।
विथ्या रामराज ने 400 मीटर बाधा दौड़ में पी.टी. उषा के लंबे समय से कायम राष्ट्रीय रिकॉर्ड को पीछे छोड़ा। महिला 4×400 मीटर रिले का स्वर्ण भी भारत की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा।
मैराथन में सावन बरवाल ने 1982 के बाद राष्ट्रीय रिकॉर्ड के साथ कांस्य पदक जीता। हाई जंप में सर्वेश कुशारे स्वर्ण से मामूली अंतर से चूक गए। उन्होंने 2.25 मीटर की ऊंचाई पार की, लेकिन चीनी ताइपे के खिलाड़ी ने यह ऊंचाई कम प्रयासों में पार कर स्वर्ण अपने नाम कर लिया।
महिला पोल वॉल्ट में बारनिका एलानगोवेन ने 4.15 मीटर की ऊंचाई पार कर कांस्य पदक जीता। यह इस स्पर्धा में भारत का पहला एशियाई खेल पदक रहा।
दूसरी ओर, बहुप्रचारित पुरुष 100 मीटर स्प्रिंट जोड़ी गुरिंदरवीर सिंह और अनिमेष कुजूर अपने व्यक्तिगत और सत्र के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से काफी नीचे रहे और पदक की दौड़ से बाहर हो गए। यह प्रदर्शन निश्चित रूप से निराशाजनक रहा।
निशानेबाजी: फिर मजबूत ताकत, लेकिन गिरावट भी
निशानेबाजी को एशियाई खेलों में भारत के सबसे मजबूत खेलों में गिना जाता है। हांगझोउ में भारतीय निशानेबाजों ने सात स्वर्ण सहित 22 पदक जीते थे। नागोया में भारत का अभियान 15 पदकों—तीन स्वर्ण, आठ रजत और चार कांस्य—के साथ समाप्त हुआ।
नीरू धांडा ने महिला ट्रैप में व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने के साथ कायनान चेनाई के साथ मिश्रित ट्रैप में भी स्वर्ण हासिल किया। कमलजीत और सुरूचि सिंह की मिश्रित 10 मीटर एयर पिस्टल जोड़ी ने भी स्वर्ण पदक जीता।
इन सफलताओं के बावजूद राइफल और पिस्टल की कुछ स्पर्धाओं में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पेरिस ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली मनु भाकर का पदक से चूकना भी भारत के लिए निराशाजनक रहा।
फिर भी, निशानेबाजी ने एक बार फिर साबित किया कि बड़े बहु-खेल आयोजनों में भारत की पदक उम्मीदों में उसका महत्वपूर्ण स्थान है।
तीरंदाजी में स्वर्णिम अभियान
नागोया में तीरंदाजी भारत के सबसे सफल खेलों में शामिल रहा। 12 सदस्यीय भारतीय दल ने पांच स्वर्ण, दो रजत और दो कांस्य सहित कुल नौ पदक जीते।
17 वर्षीय कुमकुम मोसोड ने व्यक्तिगत रिकर्व में स्वर्ण जीतकर इतिहास रचा। वह एशियाई खेलों में व्यक्तिगत रिकर्व स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।
कंपाउंड वर्ग में भी भारत ने मिश्रित और महिला टीम स्पर्धाओं में स्वर्ण हासिल किए। कुछ प्रदर्शन विश्व रिकॉर्ड के स्तर तक पहुंचे। यह सफलता बताती है कि भारत पारंपरिक पदक दिलाने वाले खेलों के अलावा अन्य खेलों में भी अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत कर रहा है।
मुक्केबाजी और कुश्ती का दम
मुक्केबाजी में भारतीय खिलाड़ियों ने तीन स्वर्ण और तीन कांस्य पदक जीते। महिलाओं में ओलंपिक पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन और परवीन हुड्डा तथा पुरुष वर्ग में अंकुश पंघाल ने स्वर्ण पदक हासिल किए।
कुश्ती में भारत ने दो स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक जीता। अमन सहरावत ने पुरुषों के 57 किलोग्राम फ्रीस्टाइल वर्ग में स्वर्ण पदक हासिल किया, जबकि सुजीत कलकल ने 65 किलोग्राम फ्रीस्टाइल में स्वर्ण जीतकर भारतीय कुश्ती की मजबूती कायम रखी।
ग्रीको-रोमन कुश्ती के 97 किलोग्राम वर्ग में नितेश सिवाच ने रजत पदक जीता। यह 1962 के बाद इस वर्ग में भारत का पहला एशियाई खेल पदक रहा।
गोल्फ में ऐतिहासिक उपलब्धि
गोल्फ में 23 वर्षीय प्रणवी उर्स ने व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा। वह एशियाई खेलों में व्यक्तिगत गोल्फ स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। भारत की महिला टीम ने टीम स्पर्धा में भी रजत पदक हासिल किया।
टीम खेलों में भारत का दबदबा
नागोया में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में टीम खेलों का शानदार प्रदर्शन रहा। क्रिकेट, हॉकी और कबड्डी में पुरुष और महिला टीमों ने स्वर्ण पदक जीते।
भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अपना खिताब बरकरार रखा। पुरुष क्रिकेट टीम ने भी स्वर्ण पदक जीता और फाइनल में पाकिस्तान को 19 रन से हराया।
हॉकी में भारत ने पुरुष और महिला दोनों वर्गों में स्वर्ण पदक जीते। पुरुष टीम ने फाइनल में मलेशिया को 5-1 से हराकर लगातार दूसरी बार एशियाई खेलों का खिताब अपने नाम किया। महिला टीम ने चीन को 1-0 से हराकर स्वर्ण पदक जीता। 44 वर्ष के लंबे इंतजार के बाद महिला हॉकी टीम को एशियाई खेलों का स्वर्ण मिला।
इन स्वर्ण पदकों का महत्व इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि पुरुष और महिला दोनों टीमों को 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक के लिए सीधे प्रवेश का टिकट मिल गया।
पुरुष सेपाक टकरा में भारत ने पहली बार कांस्य पदक जीतकर नया इतिहास रचा।
हालांकि कुछ खिलाड़ियों की फिटनेस और तैयारी पर सवाल भी उठे। चोट से उबर रहे अविनाश साबले अपेक्षित लय में नहीं दिखे, जबकि ज्योति याराजी और प्रवीण चित्रवेल अपनी स्पर्धाओं में शुरुआत ही नहीं कर सके।
702 करोड़ रुपये के निवेश के बाद सवाल
भारतीय खिलाड़ियों के जापान रवाना होने से पहले खेल मंत्रालय ने बताया था कि एशियाई खेलों की तैयारी के लिए पिछले तीन वर्षों में प्रशिक्षण, उपकरण, कोच और विशेषज्ञों पर 702 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए।
यह राशि भारतीय खेलों के प्रति सरकार की बढ़ती प्रतिबद्धता को दर्शाती है। लेकिन बड़े निवेश के साथ यह सवाल भी स्वाभाविक है कि क्या इसका लाभ सभी संभावित पदक स्पर्धाओं तक समान रूप से पहुंच रहा है?
भारत 2030 में राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में नागोया का अनुभव भविष्य की खेल नीति और तैयारी के लिए महत्वपूर्ण सबक दे सकता है।
किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत?
नागोया का प्रदर्शन कई सकारात्मक संकेत देता है, लेकिन कमजोर क्षेत्रों की पहचान भी करता है। तलवारबाजी, टेनिस, रोइंग तथा निशानेबाजी की कुछ राइफल और पिस्टल स्पर्धाओं में भारत को विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
एथलेटिक्स में भी पदक के अवसरों को अंतिम परिणाम में बदलने की क्षमता पर काम करना होगा। केवल पदकों की संख्या को सफलता का पैमाना मानना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि कितने पदक अवसर हाथ से निकले, किन खिलाड़ियों ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया, कहां नई प्रतिभाएं उभरीं और किन खेलों को ओलंपिक स्तर तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त समर्थन चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चोटिल या पूरी तरह फिट नहीं खिलाड़ियों की भागीदारी और प्रतियोगिता से पहले उनकी फिटनेस का मूल्यांकन अधिक वैज्ञानिक और स्पष्ट होना चाहिए। नागोया में कुछ घटनाओं ने इस दिशा में भी सवाल खड़े किए हैं।
खेलों के साथ आयोजन भी सवालों के घेरे में
जापान अपनी उच्च तकनीक, अनुशासन और व्यवस्थित कार्यशैली के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। ऐसे में आइची-नागोया एशियाई खेलों में सामने आई व्यवस्थागत समस्याओं ने कई लोगों को आश्चर्यचकित किया।
आवास और परिवहन की परेशानी
पैसे बचाने के प्रयास में आयोजकों ने पारंपरिक एथलीट विलेज बनाने के बजाय खिलाड़ियों और अधिकारियों को होटल, अस्थायी शिविरों और क्रूज जहाज में ठहराया। कई स्थानों पर छोटे बिस्तरों और तंग कमरों की शिकायतें सामने आईं। लंबे कद वाले खिलाड़ियों के लिए छोटे बिस्तर परेशानी का कारण बने।
कई खिलाड़ियों ने यह भी शिकायत की कि देर से होटल लौटने पर रेस्टोरेंट बंद मिलते थे, जिससे भोजन की समस्या होती थी।
आयोजकों के अनुसार उन्होंने लगभग 15,000 लोगों के लिए व्यवस्था की थी, लेकिन 17,000 से अधिक खिलाड़ी और अधिकारी पहुंच गए। परिणामस्वरूप आवासीय व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
परिवहन व्यवस्था भी सवालों के घेरे में रही। बसों के देर से पहुंचने और टीमों को गलत स्थानों पर ले जाने जैसी शिकायतें सामने आईं।
बैडमिंटन स्टार पी.वी. सिंधु ने 18 घंटे के भीतर तीन मुकाबले खेलने पर निराशा व्यक्त की। पाकिस्तान की पुरुष वॉलीबॉल टीम को एक मुकाबले से करीब एक घंटे पहले गलत जिम्नेजियम पहुंचा दिया गया।
बारिश ने भी क्रिकेट सहित कई प्रतियोगिताओं को प्रभावित किया। भारत और पाकिस्तान के दल बिना क्वार्टर फाइनल खेले सेमीफाइनल में पहुंच गए।
इन घटनाओं के बाद आयोजकों को लॉजिस्टिक और आवास संबंधी कमियों के लिए माफी मांगनी पड़ी।
खाली स्टेडियम भी चिंता का विषय
खेलों की चमक को खाली स्टेडियमों ने भी प्रभावित किया। जापानी ओलंपिक समिति की अध्यक्ष सेइको हाशिमोतो ने बड़ी संख्या में खाली सीटों को निराशाजनक बताया।
किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन की सफलता केवल पदकों और खेल परिणामों से नहीं मापी जाती। खिलाड़ियों की सुविधा, दर्शकों की भागीदारी, परिवहन, आवास, भोजन और प्रतियोगिताओं के बीच पर्याप्त विश्राम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
नागोया का सबक
आइची-नागोया एशियाई खेलों ने भारत के लिए दो अलग-अलग तस्वीरें पेश कीं। एक तरफ 85 पदकों के साथ चौथा स्थान, नई प्रतिभाओं का उभार, टीम खेलों में शानदार सफलता और तीरंदाजी जैसे खेलों का स्वर्णिम प्रदर्शन है। दूसरी तरफ एथलेटिक्स और निशानेबाजी जैसे प्रमुख पदक स्रोतों में गिरावट तथा कुछ खिलाड़ियों की फिटनेस और तैयारी से जुड़े सवाल हैं।
भारत के लिए अब चुनौती केवल पदकों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। चुनौती यह है कि हांगझोउ की 106 पदकों की उपलब्धि को पीछे छोड़ने के लिए एक ऐसी खेल प्रणाली तैयार की जाए, जिसमें अधिक खेलों में पदक की संभावनाएं विकसित हों और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को लंबे समय तक वैज्ञानिक प्रशिक्षण, बेहतर कोचिंग और उच्चस्तरीय सुविधाएं मिलें।
नागोया ने यह भी याद दिलाया कि बड़े खेल आयोजन में शानदार स्टेडियम और अत्याधुनिक तकनीक पर्याप्त नहीं हैं। खिलाड़ियों के लिए आरामदायक आवास, समय पर परिवहन, उचित भोजन, पर्याप्त विश्राम और कुशल प्रबंधन भी उतने ही जरूरी हैं।


भारत ने 85 पदकों के साथ एशिया में अपनी मजबूत स्थिति कायम रखी है। अब लक्ष्य केवल चौथे स्थान को बचाए रखना नहीं, बल्कि अगले एशियाई खेलों और 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक के लिए पदकों की संख्या के साथ-साथ पदक जीतने वाले खेलों का दायरा भी बढ़ाना होना चाहिए।