रायगढ़ से नरेन्द्र पर्वत (व्याख्याता) कि मुनादी ।। हाल ही में एक प्रमुख टीवी एंकर द्वारा शिक्षकों के संबंध में की गई टिप्पणी ने देशभर में चर्चा को जन्म दिया। अनेक शिक्षकों ने इसे अपने सम्मान पर आघात माना। यह विवाद केवल एक बयान का नहीं है, बल्कि उस व्यापक मानसिकता का प्रतीक है जिसमें समाज निर्माता शिक्षक की भूमिका को अक्सर कम करके आँका जाता है, जबकि वही शिक्षक भविष्य के वैज्ञानिक, न्यायाधीश, सैनिक, प्रशासक, पत्रकार, उद्योगपति और राजनेता तैयार करता है।
यहाँ प्रश्न किसी एक एंकर, किसी एक चैनल या किसी एक बयान का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत का शिक्षक वर्ग स्वयं अपनी सामूहिक शक्ति को पहचानता है?
आचार्य चाणक्य ने कहा था कि किसी राष्ट्र का उत्थान और पतन उसकी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है। इतिहास इसका प्रमाण है। तक्षशिला के एक शिक्षक ने अखंड भारत के निर्माण की नींव रखी। स्वामी विवेकानंद के पीछे रामकृष्ण परमहंस थे। महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्तित्वों के पीछे भी अनगिनत शिक्षकों का योगदान था।
आज टीवी स्टूडियो में बैठकर राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, संविधान और विकास पर बहस करने वाले एंकर भी कभी किसी शिक्षक की कक्षा में बैठे विद्यार्थी ही थे। संसद में कानून बनाने वाले नेता भी किसी शिक्षक की उँगली पकड़कर अक्षर ज्ञान सीखकर आगे बढ़े हैं। न्यायालयों में निर्णय देने वाले न्यायाधीश, अस्पतालों में सेवा देने वाले डॉक्टर और सीमा पर खड़े सैनिक भी शिक्षकों की ही देन हैं।
फिर भी विडंबना यह है कि समाज में शिक्षक की शक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप में नहीं देखा जाता।
यदि भारत के करोड़ों शिक्षक केवल एक दिन यह निर्णय कर लें कि वे केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि विद्यार्थियों में नागरिक चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व, संवैधानिक मूल्यों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण करेंगे, तो देश की राजनीति, मीडिया और समाज तीनों की दिशा बदल सकती है।
शिक्षकों की एकता का अर्थ हड़ताल या टकराव नहीं है। शिक्षकों की वास्तविक शक्ति उनकी संख्या में नहीं, बल्कि उनके प्रभाव में है। एक शिक्षक प्रतिवर्ष सैकड़ों विद्यार्थियों को प्रभावित करता है। लाखों शिक्षक मिलकर करोड़ों युवाओं के विचारों को आकार देते हैं। यह प्रभाव किसी राजनीतिक दल, मीडिया समूह या कॉर्पोरेट संस्था से कहीं अधिक व्यापक और स्थायी है।
आज आवश्यकता है कि शिक्षक वर्ग अपने सम्मान की रक्षा केवल प्रतिक्रियाओं से नहीं, बल्कि अपने सामूहिक बौद्धिक नेतृत्व से करे। जब शिक्षक एक स्वर में शिक्षा की गुणवत्ता, विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर बोलेंगे, तब देश को उन्हें सुनना ही पड़ेगा।
टीवी एंकर एक दिन की बहस से जनमत को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन शिक्षक दशकों तक समाज की चेतना को गढ़ते हैं। एंकर समाचार प्रस्तुत करते हैं, शिक्षक भविष्य का निर्माण करते हैं। एंकर घटनाओं की व्याख्या करते हैं, शिक्षक उन लोगों को तैयार करते हैं जो भविष्य की घटनाएँ रचते हैं।
इसलिए भारत के शिक्षकों को अपनी शक्ति पहचाननी होगी। उन्हें यह समझना होगा कि वे केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता हैं। यदि वे संगठित होकर शिक्षा, संस्कार और चरित्र निर्माण का अभियान चलाएँ, तो समाज में व्याप्त अनेक समस्याओं का समाधान स्वयं उत्पन्न हो सकता है।
आज समय आ गया है कि शिक्षक अपने सम्मान के लिए किसी और से प्रमाणपत्र माँगना बंद करें। उन्हें अपने कार्य और अपनी एकता से यह सिद्ध करना होगा कि राष्ट्र का वास्तविक भविष्य न तो टीवी स्टूडियो में लिखा जाता है, न राजनीतिक मंचों पर वह कक्षा-कक्ष में लिखे जाने वाले उन पहले अक्षरों से शुरू होता है जिन्हें एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों को सिखाता है।
चाणक्य का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—यदि शिक्षक जागृत और संगठित है तो राष्ट्र का उत्थान निश्चित है यदि शिक्षक उपेक्षित और विभाजित है तो राष्ट्र की प्रगति भी अधूरी रह जाएगी। यह संस्करण किसी विशेष व्यक्ति पर व्यक्तिगत आक्रमण किए बिना शिक्षकों की भूमिका, सम्मान और सामूहिक शक्ति पर केंद्रित है आज अगर पूरे भारत का शिक्षक ठान ले कि व्यवस्था में बदलाव निश्चित करना आवश्यक है तो वह दिन दूर नहीं जब आमूल - चूल बदलाव हो कर रहेंगे और यही आमूल - चूल बदलाव ही तो क्रांति होगी ।