मुनादी रायगढ़।। सरकारी उपक्रम होने का भरोसा देकर ग्रामीणों की जमीन लेने वाली साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) का असली चेहरा अब सामने आ रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि निजी उद्योगपति भी इतना फरेब नहीं करते, जितना SECL कर रहा है। 10 साल पहले किए वादे आज तक अधूरे हैं और अब फिर से उजाड़ने की तैयारी है।


प्राप्त जानकारी के अनुसार SECL की बरौद कोयला खदान विस्तार परियोजना के लिए कल जनसुनवाई प्रस्तावित है। इस विस्तार के लिए 1856 हेक्टेयर जमीन ली जा रही है, जिससे 7 गांव सीधे प्रभावित होंगे। ग्रामीणों में इसे लेकर भारी नाराजगी है।
10 साल पहले का वादा, आज तक छलावा
ग्रामीणों ने बताया कि ठीक 10 साल पहले हुई जनसुनवाई में SECL प्रबंधन ने बड़े-बड़े वादे किए थे -
1. प्रति 1.5 एकड़ जमीन के बदले परिवार के एक व्यक्ति को स्थायी नौकरी दी जाएगी।
2. सभी प्रभावित गांवों का CSR मद से संपूर्ण विकास किया जाएगा।
3. भूमिहीन परिवारों का क्षमता विकास कर उन्हें रोजगार के वैकल्पिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।
लेकिन 10 साल बीत जाने के बाद एक भी वादा धरातल पर नहीं उतरा। ग्रामीण आज भी नौकरी और विकास के लिए भटक रहे हैं।
"SECL ने कागज पर तो पूरा गांव बसाने का वादा किया था, लेकिन जमीन लेने के बाद पलट गई। 10 साल से हमारे युवा बेरोजगार घूम रहे हैं। अब फिर 7 गांव उजाड़ने आ गए हैं।" - एक प्रभावित ग्रामीण
दस साल बीत गए, आखिर इन वादों का हिसाब कौन देगा?
क्या रोजगार का वादा पूरा हुआ?
क्या प्रत्येक प्रभावित परिवार को उसका अधिकार मिला?
क्या भूमिहीनों के लिए घोषित रोजगार और कौशल विकास की व्यवस्था प्रभावी रूप से जमीन पर पहुंची?
और जिन गांवों के विकास का भरोसा दिया गया था, उनकी मौजूदा स्थिति क्या है?
SECL ने एक आधिकारिक जवाब में स्थानीय रोजगार और विकास से जुड़े सवालों का उल्लेख करते हुए बताया था कि 344 लोगों को रोजगार दिया गया था, जबकि कुल 639 का आंकड़ा दर्ज था। उसी दस्तावेज में कंपनी ने CSR के तहत सड़क निर्माण, 13 स्कूलों में स्मार्ट क्लास, विद्यार्थियों के लिए बस सुविधा और पेयजल के लिए बोरवेल जैसी गतिविधियों का भी उल्लेख किया है।
यानी कंपनी की ओर से विकास कार्यों का दावा मौजूद है, लेकिन ग्रामीणों की शिकायत है कि इन दावों और जमीन पर महसूस होने वाले विकास के बीच बड़ा अंतर है।
छाल में नदी बनी टापू, NGT के आदेश की भी अनदेखी
SECL के छाल प्रोजेक्ट की हकीकत और भी भयावह है। कंपनी के डस्ट और ओवरबर्डन से पूरी नदी में टापू बन गए हैं, नदी का पानी पूरी तरह दूषित हो रहा है। जबकि 2016 में ही NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) ने SECL को नदी को साफ रखने और प्रदूषण रोकने का स्पष्ट आदेश दिया था। इसके बावजूद न नदी साफ हुई, न प्रदूषण रुका, उल्टा अब उसी खदान का और विस्तार किया जा रहा है।ऐसे में ग्रामीणों का सवाल है—
जब मौजूदा खनन गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सवाल बने हुए हैं, तो विस्तार से पहले पुराने पर्यावरणीय और सामाजिक दायित्वों का हिसाब क्यों न लिया जाए?
क्षेत्र का विकास या विनाश?


सवाल उठ रहा है कि जब 10 साल में पुराने प्रभावित गांवों का ही विकास नहीं कर पाई, तो 7 नए गांवों को उजाड़कर SECL कौन सा विकास करेगी? ग्रामीणों ने कल होने वाली जनसुनवाई का पुरजोर विरोध करने का ऐलान किया है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले पुराने वादे पूरे किए जाएं, तब नई जनसुनवाई हो।