रायगढ़ मुनादी।। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत मिशन और प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण ग्रामीण भारत में जीवन की बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से संचालित की जा रही हैं। करोड़ों रुपये खर्च कर गांवों में पेयजल, स्वच्छता और बेहतर आवासीय वातावरण उपलब्ध कराने की कोशिश हो रही है। लेकिन रायगढ़ तहसील के ग्राम सांगीतराई में सामने आए एक राजस्व विवाद ने इन योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन और प्रशासनिक निर्णयों की दिशा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।



मामला एक ऐसी भूमि से जुड़ा है, जिसके मिशल में भू-स्वामी बताया गया है और इसके प्रकृति के विषय में कहीं भी तालाब दर्ज नहीं है। वहीं इस भूमि के आधार अभिलेख में पानी-पार के रूप में उल्लेखित किया गया है। इसका अर्थ यह है कि आधार अभिलेख बनने से पहले भूमिस्वामी द्वारा आसपास के भूमि की सिंचाई की दृष्टि से तालाब खोदवाया गया होगा। इसके अतिरिक्त इसी प्रकरण से संबंधित 12 अप्रैल 2024 की नामांतरण पंजी में यह उल्लेख किया गया था कि संबंधित भूमि चकबंदी खसरे में तालाब के रूप में दर्ज है, लेकिन वर्तमान में वहां आम निस्तार नहीं हो रहा है। इसके बावजूद बाद के निर्णय में पुराने पंचसाला अभिलेखों की निस्तार संबंधी प्रविष्टियों को आधार बनाए जाने पर सवाल उठ रहे हैं।
पंचायत सचिव के बयान से सामने आई गांव की तस्वीर
ग्राम सांगीतराई के पंचायत सचिव सत्रुघन जायसवाल के अनुसार ग्राम पंचायत वर्ष 2017 से ओ.डी.एफ. घोषित है। वर्तमान में स्वच्छ भारत मिशन के तहत गांव के लगभग 95 प्रतिशत घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाया जा रहा है। पंचायत के अनुसार गांव में कुल तीन सरकारी तालाब हैं। इनमें से दो तालाब गर्मी के महीनों में सूख जाते हैं, जबकि पंचायत भवन के पास स्थित सरकारी तालाब का उपयोग ग्रामीण वर्षभर निस्तारी के लिए करते हैं।
ऐसे में निजी भूमि को लेकर यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि गांव में सार्वजनिक उपयोग के लिए सरकारी जलस्रोत मौजूद हैं और ग्रामीण उन्हीं का उपयोग करते हैं, तो गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित निजी भूमि को आम निस्तार के लिए आवश्यक मानने का प्रशासनिक आधार क्या है ? जो कि पहुंच विहीन भी है। यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि उपलब्ध राजस्व अभिलेखों और जमीनी स्थिति के बीच सामंजस्य का है।
एक ही मामले में अभिलेखों की अलग-अलग तस्वीर क्यों ?
पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू राजस्व रिकॉर्ड में दिखाई देने वाला विरोधाभास है। एक ओर 12 अप्रैल 2024 की नामांतरण पंजी में संबंधित भूमि के चकबंदी खसरे में तालाब दर्ज होने तथा “वर्तमान में आम निस्तार नहीं हो रहा है” जैसी स्थिति का उल्लेख सामने आता है। दूसरी ओर उसी तहसीलदार के निर्णय में पुराने पंचसाला अभिलेखों में दर्ज निस्तार संबंधी प्रविष्टियों को महत्व दिया गया।
यही वह बिंदु है जहां प्रशासनिक निर्णय की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं। यदि किसी सरकारी अभिलेख में वर्तमान स्थिति के संबंध में स्पष्ट टिप्पणी दर्ज थी, तो बाद में निर्णय लेते समय उस प्रविष्टि पर क्या विचार किया गया ? यदि उसे अप्रासंगिक माना गया, तो उसका कारण क्या था ? और यदि पुराने अभिलेखों को वर्तमान स्थिति पर प्राथमिकता दी गई, तो उसके पीछे राजस्व नियमों और रिकॉर्ड की कौन-सी व्याख्या लागू की गई ? इन सवालों का स्पष्ट उत्तर आदेश में होना इसलिए जरूरी है क्योंकि राजस्व विवादों में अभिलेखों की निरंतरता और वर्तमान स्थिति दोनों का महत्व होता है।
योजनाओं की भावना और प्रशासनिक निर्णय के बीच सवाल
जल जीवन मिशन का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराना है। इसके लिए गांवों में पाइपलाइन, घरेलू नल कनेक्शन और जलस्रोतों की स्थायी व्यवस्था पर जोर दिया जा रहा है। दूसरी ओर स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता, स्वास्थ्यकर वातावरण और ओ.डी.एफ. व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में काम करता है। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण भी केवल ग्रामीण परिवारों को मकान उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। आवास के साथ पेयजल, स्वच्छता और बेहतर रहने का वातावरण ग्रामीण जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़े हुए हैं। ऐसे में सांगीतराई का विवाद व्यापक नीति के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि एक तरफ सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक सुविधाओं को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है, वहीं दूसरी तरफ किसी निजी भूमि को निस्तार से जोड़ने वाला राजस्व निर्णय विभाग पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी एक तहसीलदार के आदेश से केंद्र सरकार की योजनाएं सीधे प्रभावित या निष्प्रभावी हो गई हैं। लेकिन इतना जरूर है कि ऐसे निर्णयों से योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन और प्रशासनिक रिकॉर्ड के बीच समन्वय पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
ग्राम पंचायत के अनुसार गांव में तीन सरकारी तालाब मौजूद हैं और उनमें से कम से कम एक तालाब का उपयोग ग्रामीण वर्षभर करते हैं। ऐसे में लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित और पहुंच विहीन निजी भूमि को आम निस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानने का तर्क ग्रामीणों के लिए समझ से परे है।
ग्रामीण विकास की योजनाओं में अभिलेखों की स्पष्टता जरूरी
सांगीतराई का मामला केवल एक नामांतरण विवाद के रूप में देखा जाए तो यह एक सीमित राजस्व प्रकरण हो सकता है। लेकिन जब इसे ग्रामीण विकास की व्यापक पृष्ठभूमि में देखा जाता है तो इसकी अहमियत बढ़ जाती है। सरकार एक ओर गांवों में जल संरक्षण, स्वच्छता, पेयजल और आवास की सुविधाएं बढ़ा रही है। ऐसे में सरकारी और निजी जलस्रोतों की वास्तविक स्थिति तथा उनके उपयोग से संबंधित राजस्व अभिलेखों में स्पष्टता होना भी उतना ही जरूरी है। यदि किसी भूमि का वर्तमान में सार्वजनिक उपयोग नहीं हो रहा है, तो अभिलेखों में दर्ज पुरानी स्थिति और वर्तमान वास्तविकता के बीच अंतर को प्रशासनिक आदेश में स्पष्ट किया जाना चाहिए। वहीं यदि पुरानी निस्तार व्यवस्था आज भी विधिक रूप से प्रभावी मानी जाती है, तो उसके आधार और प्रमाण भी स्पष्ट रूप से सामने आने चाहिए।
अब उच्च स्तर पर समीक्षा की मांग


सांगीतराई के इस मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या पुराने राजस्व अभिलेखों और वर्तमान जमीनी स्थिति के बीच पैदा हुए अंतर को पर्याप्त रूप से समझे बिना लिया गया निर्णय भविष्य में ग्रामीणों के लिए नए विवाद का कारण बन सकता है ? मामला अब केवल एक निजी भूमि के नामांतरण तक सीमित नहीं दिख रहा है। यह प्रशासनिक निर्णयों में अभिलेखीय पारदर्शिता, वर्तमान वास्तविकता और ग्रामीण विकास योजनाओं की मूल भावना के बीच संतुलन का प्रश्न बन गया है। इसलिए तहसीलदार के निर्णय की उच्च स्तर पर समीक्षा कर यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि आखिर एक ही राजस्व प्रकरण में 12 अप्रैल 2024 के अभिलेख और पुराने पंचसाला रिकॉर्ड के बीच दिखाई देने वाले अंतर का समाधान किस आधार पर किया गया। क्योंकि ग्रामीण विकास योजनाओं की सफलता केवल बजट और निर्माण से नहीं, बल्कि उन योजनाओं से जुड़े संसाधनों, अभिलेखों और प्रशासनिक निर्णयों की स्पष्टता से भी तय होती है। सांगीतराई का विवाद इसी व्यापक सवाल को सामने ला रहा है।