नरेन्द्र पर्वत (व्याख्याता) की मुनादी ।। भारत ने पिछले कुछ दशकों में जिस जनसांख्यिकीय परिवर्तन का अनुभव किया है, वह विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जा सकता है। एक समय था जब भारत को "जनसंख्या विस्फोट" का प्रतीक माना जाता था। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह आशंका व्यक्त की जाती थी कि भारत की बढ़ती जनसंख्या उसके विकास, संसाधनों और पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिद्ध होगी। किंतु आज स्थिति बदल चुकी है। भारत की कुल प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे पहुँच चुकी है और देश एक नए जनसांख्यिकीय युग में प्रवेश कर रहा है।
यह परिवर्तन हमें बीसवीं शताब्दी के दो महान विचारकों—पॉल एरलिच और जूलियन साइमन—की बहुचर्चित बहस की याद दिलाता है।
पॉल एरलिच का मानना था कि अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि अंततः मानव सभ्यता को संसाधन संकट, भूख, बेरोजगारी और पर्यावरणीय विनाश की ओर ले जाएगी। दूसरी ओर अर्थशास्त्री जूलियन साइमन का विश्वास था कि मनुष्य स्वयं सबसे बड़ा संसाधन है। उनके अनुसार जितने अधिक लोग होंगे, उतने ही अधिक वैज्ञानिक, इंजीनियर, उद्यमी और नवप्रवर्तक होंगे, जो नई तकनीकों और समाधानों के माध्यम से संसाधनों की सीमाओं को लगातार विस्तारित करते रहेंगे।
आज भारत की स्थिति को देखें तो दोनों विचारकों के तर्क आंशिक रूप से सही प्रतीत होते हैं।
निस्संदेह, घटती प्रजनन दर ने भारत को जनसंख्या विस्फोट की आशंकाओं से काफी हद तक मुक्त कर दिया है। भूमि, जल, ऊर्जा और सार्वजनिक सेवाओं पर बढ़ते दबाव की गति धीमी पड़ सकती है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति निवेश बढ़ाने की संभावनाएँ भी मजबूत हुई हैं। यह एरलिच के उस विचार को बल देता है कि अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण विकास के लिए आवश्यक है।
लेकिन दूसरी ओर, कम होती जन्मदर एक नई चुनौती भी लेकर आ रही है। दक्षिण भारत के कई राज्य—केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र—तेजी से वृद्ध होती आबादी की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले वर्षों में इन राज्यों में कार्यशील आयु वर्ग की संख्या घटेगी, जबकि वृद्ध नागरिकों की संख्या बढ़ेगी। परिणामस्वरूप श्रमिकों की कमी, सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ता बोझ और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग जैसी समस्याएँ सामने आएँगी। यह स्थिति जूलियन साइमन की उस चिंता को पुष्ट करती है कि मानव संसाधन की कमी आर्थिक प्रगति को बाधित कर सकती है।
भारत का भविष्य वास्तव में उसके राज्यों की जनसांख्यिकीय विविधता में छिपा हुआ है।
दक्षिण और पश्चिम भारत वृद्धावस्था की चुनौतियों का सामना करेंगे, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य अभी भी अपेक्षाकृत युवा आबादी वाले प्रदेश बने रहेंगे। यही राज्य आने वाले दशकों में भारत की श्रमशक्ति के प्रमुख स्रोत होंगे। यदि इन राज्यों के युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार उपलब्ध कराया गया, तो वे भारत की आर्थिक प्रगति के इंजन बन सकते हैं। लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यही जनसंख्या बेरोजगारी, असंतोष और सामाजिक तनाव का कारण भी बन सकती है।
यही वह बिंदु है जहाँ भारत के नीति-निर्माताओं को जनसंख्या की संख्या से अधिक उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। आज का प्रश्न यह नहीं है कि भारत में कितने लोग रहते हैं, वास्तविक प्रश्न यह है कि भारत के नागरिक कितने शिक्षित, कुशल, स्वस्थ और उत्पादक हैं।
इतिहास साक्षी है कि जिन देशों ने अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का सही उपयोग किया, वे आर्थिक महाशक्ति बने। जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और सिंगापुर इसके उदाहरण हैं। वहीं जिन देशों ने अपनी युवा आबादी को शिक्षा और रोजगार से नहीं जोड़ा, वहाँ जनसांख्यिकीय अवसर सामाजिक संकट में बदल गया।
भारत के सामने भी यही विकल्प है।
यदि भारत अपने युवाओं को ज्ञान, कौशल और अवसर प्रदान करता है, तो घटती प्रजनन दर उसके लिए वरदान सिद्ध हो सकती है। इससे प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी, जीवन स्तर सुधरेगा और देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकेगा। लेकिन यदि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में आवश्यक सुधार नहीं किए गए, तो आज का जनसांख्यिकीय लाभांश कल की गंभीर चुनौती बन सकता है।
पॉल एरलिच ने हमें पृथ्वी की सीमाओं के प्रति सावधान किया था। जूलियन साइमन ने मानव बुद्धि की असीम संभावनाओं पर विश्वास जताया था। भारत का भविष्य इन दोनों दृष्टिकोणों के संतुलन में निहित है। हमें संसाधनों का संरक्षण भी करना है और मानव संसाधन का विकास भी।
अंततः भारत की सफलता इस बात से निर्धारित नहीं होगी कि उसकी जनसंख्या कितनी है, बल्कि इस बात से होगी कि वह अपने प्रत्येक नागरिक की क्षमता को किस सीमा तक विकसित कर पाता है। इक्कीसवीं सदी का भारत जनसंख्या की बहस से आगे बढ़ चुका है अब उसकी वास्तविक चुनौती मानव पूंजी के निर्माण की है।