नरेन्द्र पर्वत (व्याख्याता) की मुनादी ।। भारतीय संविधान की प्रस्तावना के प्रथम शब्द हैं— "हम भारत के लोग"। ये मात्र शब्द नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक चरित्र की आत्मा हैं। इन तीन शब्दों में यह घोषणा निहित है कि इस देश की सर्वोच्च सत्ता किसी राजा, शासक, दल, धर्म या संस्था में नहीं, बल्कि भारत के लोगों में निहित है। संविधान निर्माताओं ने यह स्पष्ट किया था कि भारत का भविष्य जनता स्वयं निर्धारित करेगी और राज्य जनता की सेवा का माध्यम होगा। किन्तु आज प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या "हम भारत के लोग" की भावना वास्तव में भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में बनी हुई है, या वह केवल संविधान की प्रस्तावना तक सीमित होकर रह गई है?। आज देश अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ दिखाई देता है। मणिपुर जैसे राज्य महीनों तक हिंसा की आग में जलते रहे, हजारों लोग विस्थापित हुए, परंतु समाधान की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सकी। यदि किसी राज्य के नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस करें तो संविधान द्वारा प्रदत्त "बंधुता" और "राष्ट्रीय एकता" के आदर्शों पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
शिक्षा के क्षेत्र में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामले युवाओं के विश्वास को कमजोर कर रहे हैं। वर्षों तक तैयारी करने वाला विद्यार्थी जब परीक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था देखता है, तो उसके मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या अवसरों की समानता केवल एक संवैधानिक आदर्श बनकर रह गई है?
कृषि क्षेत्र में भी समस्याएँ कम नहीं हैं। अनेक क्षेत्रों में किसानों को समय पर खाद और अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाते। देश का अन्नदाता यदि अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहा हो, तो सामाजिक और आर्थिक न्याय की अवधारणा अधूरी प्रतीत होती है।
दूसरी ओर बेरोजगारी और महँगाई का प्रश्न आम नागरिक के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा है। कामगारों और युवाओं के सामने सम्मानजनक रोजगार का संकट है। पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस की बढ़ती कीमतें मध्यमवर्ग और गरीब परिवारों के बजट को प्रभावित करती हैं। खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें जीवन को और कठिन बनाती हैं। ऐसे में नागरिक पूछता है कि विकास के दावों और उसकी वास्तविक परिस्थितियों के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है?
देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़े प्रश्न भी समय-समय पर सामने आते रहते हैं। जब देश के भीतर आतंकी हमले, हिंसक घटनाएँ या गंभीर कानून-व्यवस्था संबंधी चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं, तब नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंता स्वाभाविक हो जाती है। राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
इन परिस्थितियों में यह प्रश्न उठना अस्वाभाविक नहीं है कि क्या हम संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के उद्देश्यों से कहीं भटक तो नहीं गए हैं?
हालाँकि इस प्रश्न का उत्तर केवल निराशा में नहीं खोजा जा सकता। भारत का लोकतंत्र अनेक संकटों से गुजरते हुए भी जीवित और सक्रिय रहा है। संविधान ने नागरिकों को केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुधारने के लोकतांत्रिक साधन भी दिए हैं। चुनाव, न्यायपालिका, मीडिया, नागरिक समाज और जनमत— ये सभी लोकतंत्र को आत्मसुधार की क्षमता प्रदान करते हैं।
वास्तविक चुनौती संविधान की प्रस्तावना को बदलने की नहीं, बल्कि उसके आदर्शों को व्यवहार में उतारने की है। "हम भारत के लोग" का अर्थ केवल वोट देने वाली जनता नहीं, बल्कि जागरूक, उत्तरदायी और प्रश्न पूछने वाली नागरिकता भी है। यदि नागरिक अन्याय, भ्रष्टाचार, भेदभाव और प्रशासनिक विफलताओं पर मौन रहेंगे, तो संविधान के आदर्श कमजोर पड़ेंगे। वहीं यदि सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह रहें और नागरिक सक्रिय भागीदारी निभाएँ, तो यही शब्द भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन सकते हैं।
आज आवश्यकता आत्ममंथन की है। हमें यह पूछना होगा कि क्या हमारी नीतियाँ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रही हैं? क्या विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों को मिल रहा है? क्या युवाओं, किसानों, महिलाओं और कामगारों की आकांक्षाओं को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है?
"हम भारत के लोग" कोई बीता हुआ नारा नहीं, बल्कि एक सतत् राष्ट्रीय संकल्प है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत की शक्ति उसके संविधान में नहीं, बल्कि संविधान के मूल्यों को जीवित रखने वाले लोगों में निहित है। जब तक जनता न्याय, समानता और उत्तरदायित्व की माँग करती रहेगी, तब तक यह वाक्य भारतीय लोकतंत्र की आत्मा बना रहेगा। लेकिन यदि नागरिकों और संस्थाओं दोनों ने इन मूल्यों से दूरी बना ली, तो प्रस्तावना के ये शब्द केवल इतिहास की एक सुंदर पंक्ति बनकर रह जाएंगे।
इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है— क्या हम वास्तव में "हम भारत के लोग" हैं, या केवल "हम भारत के दर्शक" बनकर रह गए हैं?