केलो बचेगी, तभी रायगढ़ बचेगा

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June 30, 2026



केलो बचेगी, तभी रायगढ़ बचेगा

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डॉ.नरेन्द्र पर्वत की मुनादी।।  रायगढ़ की पहचान केवल उसके उद्योग नहीं हैं, बल्कि उसकी जीवनदायिनी केलो नदी भी है। यही नदी शहर की प्यास बुझाती है, किसानों की उम्मीदों को सींचती है और पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी को जीवित रखती है। विडंबना यह है कि जिस केलो परियोजना का निर्माण किसानों की सिंचाई के उद्देश्य से किया गया था, उसकी लिंक नहरें आज तक पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो सकीं। परिणामस्वरूप किसान अपेक्षित लाभ से वंचित हैं, जबकि इस जल का बड़ा हिस्सा उद्योगों को उपलब्ध कराया जा रहा है।इससे भी अधिक गंभीर प्रश्न केलो नदी के अस्तित्व का है। नदी के आसपास उद्योगों से निकलने वाली डस्ट और अन्य औद्योगिक अपशिष्टों को खुले स्थानों पर डाले जाने की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। यदि इन अपशिष्टों का वैज्ञानिक और सुरक्षित प्रबंधन नहीं किया जाता, तो वर्षा के दौरान इनमें मौजूद रासायनिक तत्व बहकर नदी तक पहुंच सकते हैं। ऐसी स्थिति केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि लाखों लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का विषय है।

औद्योगिक अपशिष्टों में उद्योग के प्रकार के अनुसार सीसा (Lead), पारा (Mercury), कैडमियम (Cadmium), क्रोमियम (Chromium), आर्सेनिक (Arsenic) जैसी भारी धातुएं तथा अन्य रासायनिक यौगिक पाए जा सकते हैं। इनका लंबे समय तक संपर्क मानव शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी विशेष उद्योग से कौन-कौन से रसायन निकल रहे हैं, इसका निर्धारण केवल अधिकृत वैज्ञानिक परीक्षणों से ही संभव है। इसलिए नियमित और पारदर्शी जांच अनिवार्य है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि केलो नदी का पानी शोधन के बाद शहरवासियों को पेयजल के रूप में भी उपलब्ध कराया जाता है। यदि नदी का जल प्रदूषित होता है, तो उसका प्रभाव केवल जलीय जीवों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह जनस्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर डाल सकता है। स्वच्छ जल प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और इसकी सुरक्षा प्रशासन, उद्योग तथा समाज—तीनों की साझा जिम्मेदारी है।

औद्योगिक विकास किसी भी क्षेत्र की आर्थिक उन्नति के लिए आवश्यक है, किंतु विकास की कीमत प्रकृति और मानव स्वास्थ्य नहीं हो सकती। उद्योगों को पर्यावरणीय मानकों का कठोरता से पालन करना चाहिए, प्रदूषण नियंत्रण के आधुनिक उपाय अपनाने चाहिए और अपशिष्टों का वैज्ञानिक निपटान सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही, प्रशासन को जल गुणवत्ता की नियमित जांच कर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि जनता का विश्वास बना रहे।

अब समय आ गया है कि केलो परियोजना की लंबित लिंक नहरों को शीघ्र पूरा किया जाए, जिससे किसान भी उस परियोजना का लाभ प्राप्त कर सकें जिसके लिए यह बनाई गई थी। साथ ही, नदी तट पर औद्योगिक अपशिष्टों के अनियंत्रित डंपिंग पर प्रभावी रोक लगाई जाए और दोषी पाए जाने वालों पर कठोर कार्रवाई हो।

केलो नदी केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि रायगढ़ की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवनरेखा है। यदि हमने आज इसकी रक्षा नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी।

विकास और पर्यावरण विरोधी नहीं, बल्कि पूरक होने चाहिए। केलो बचेगी, तभी रायगढ़ सुरक्षित रहेगा।

                


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