23-April-2020


एक गांव जो लॉकडाउन के कारण फिर 16 वर्ष बाद आया सुर्खियों में…..प्रदेश में नक्सली उत्पात का विरोध करने वाला यह पहला गांव आज भी अपने सम्मान की ........ पढिये पूरी खबर



प्रतापपुर मुनादी ।।


सूरजपुर जिले के सुदूर अंचल के साथ प्रतापपुर-ओड़गी का सीमावर्ती गांव जजावल आज फिर सुर्खियों में है। इस मर्तबा इसके सुर्खियों में आने की वजह प्रवासी मजदूरों के लिए जिला प्रशासन द्वारा बनाये गए राहत कैम्प है। जहां पर आज झारखंड प्रान्त के 97 मजदूरों को कोरोना की वजह से हुए लॉकडाउन के कारण शरण दी गई है। जिला प्रशासन इनकी सुविधा के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा है, लेकिन जब बात जजावल की आती है तो 2004 का वो दौर भी सामने आ जाता है जब नक्सलियों के उत्पात से अविभाजित सरगुजा काफी सहमा हुआ था। यहां पर आदिवासी ग्रामीणों ने बस्तर के सलवा जुडूम से काफी पहले ही नक्सलियों का विरोध करते हुए एकजुटता से उनका विरोध किया था, जिसके गंभीर परिणाम गांव वालों को भुगतने भी पड़े। उस दौरान शासन प्रशासन की ओर से गांव के विकास को लेकर कई वायदे भी किये गए लेकिन अफसोस तब और आज में पूरे वायदे खोखले ही साबित हुए। वायदे तो अलग नक्सल पीड़ित ग्रामीणों को आज तक उनकी क्षति का मुवावजा भी नहीं दिया गया है।


प्रतापपुर मुख्यालय से लगभग 20 किमी पश्चिम की ओर स्थित जजावल आज भले ही राहत कैम्प की वजह से चर्चाओं में है, लेकिन 16 वर्ष पूर्व नक्सलियों के खिलाफ फूंकें गए बिगुल ने इस गांव की हिम्मत व संघर्ष से जिला ही नहीं प्रदेश को भी वाकिफ करा दिया था। यूं तो इस गांव में सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण युरेनियम की खोज के साथ इसके उत्खनन व प्रोसेसिंग का भी महत्त्वपूर्ण कार्य परमाणु ऊर्जा विभाग करा चुका है, लेकिन नक्सलियों से आमना-सामना करते हुते यह 15 अगस्त 2004 को सुर्खियों में आया। दरअसल उस दौर में पूरा अविभाजित सरगुजा नक्सलियों के उत्पात से भयाक्रांत था। तब जजावल नक्सलियों के "रेड कॉरिडोर" का वो महत्त्वपूर्ण हिस्सा था, जिससे होकर नक्सली ओड़गी होते हुए कोरिया जिले के सोनहत के बाद मध्यप्रदेश तक चले जाते थे।यह जंगली व पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण सुरक्षागत कारणों से भी नक्सलियों के लिए महफूज आरामगाह थी। धीरे-धीरे नक्सलियों के बढ़ते उत्पात व एक घर से एक युवा को नक्सली दल में शामिल करने के फरमान ने ग्रामीणों को झकझोर दिया। उस दौरान नक्सलियों को लेकर अंदरूनी विरोध तो काफी हुआ, लेकिन हिम्मत जजावल के ग्रामीणों ने दिखाई। इसके लिए गांव में बैठक हुई और निर्णय लिया गया कि अब नक्सलियों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया जाए।

15 अगस्त 2004 मुकर्रर हुई तारीख


गांव में नक्सलियों के प्रवेश के साथ उनके राशन आदि की व्यवस्था का विरोध करने के लिए ग्रामीणों ने अगस्त माह में ही अंदरूनी बैठक करनी शुरू कर दी। वजह थी कि नक्सली हमेशा की भांति राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस के दिन स्कूल व अन्य शासकीय संस्थाओ में राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने का विरोध करेंगे और काले झंडे लगाएंगे। ग्रामीणों ने 15 अगस्त को सभी शासकीय संस्थाओं में न केवल तिरंगा फहराया बल्कि गांव में तिरंगे के साथ रैली भी निकाली। यह पूरी घटना नक्सलियों को नागवार गुजरी, क्योंकि एक जगह विरोध के स्वर पूरे प्रभावित क्षेत्र में लोगों को जागरूक कर सकती थी व उनके "रेड-कॉरिडोर" का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा भी इससे प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित हो रहा था। इसी से नाराज नक्सलियों ने घात लगाकर 28 अगस्त की रात इस गांव पर हमला कर दिया। एक सौ से ज्यादा नक्सली पूरे हथियारों से लैस होकर रात भर गांव में तांडव मचाते रहे। उन्होनें आंदोलन की अगुवाई कर रहे पकनी के शंकर सिंह के घर में जमकर उत्पात मचाया। इसके बाद वे जजावल पहुंचकर चंद्रदेव सिंह, हरकेश्वर सिंह के घर को आग के हवाले कर दिया। इस दौरान ग्रामीण किसी तरह जान बचाकर भागने में तो सफल हो गए लेकिन आंदोलन की अगुवाई कर रहे शंकर सिंह, बनवीर सिंह, चंदन सिंह, लक्ष्मण सिंह, गुलाब सिंह की बेदम पिटाई की। नक्सलियों ने सचिव त्रिभुवन सिंह की भी मोटरसाइकिल में आग लगा दी। रात भर नक्सली उत्पात कर चेतावनी देते हुए वापस चले गए।

प्रशासनिक उपेक्षा के बाद भी हिम्मत नहीं हारी


जजावल गांव के लोग आज भी उस घटना को याद कर सिहर उठते है। ग्रामीणों ने किसी प्रशासनिक वायदों पर नक्सलियों का सामना नहीं किया था, बल्कि यह तो नक्सलियों की प्रताड़ना का स्वस्फूर्त पुरजोर विरोध था। ग्रामीणों के मन में आज भी टीस है कि 15 अगस्त को विरोध के स्वर के बाद आखिर प्रशासन ने किसी अनहोनी की संभावना पर यहां के लिए कोई सुरक्षात्मक कदम क्यों नहीं उठाए। ग्रामीण डर-डर कर समय निकालते रहे और आखिरकार 13 दिन बाद नक्सलियों ने घटना को अंजाम दे ही दिया। इस दौरान पकनी के शंकर सिंह कई महीनों तक घर से दूर छुप कर रहे तो चंद्रदेव सिंह ने कथित तौर पर अपने रिश्तेदार पुलिस अधिकारी की शरण में समय बिताया, लेकिन अन्य ग्रामीण गांव में ही हिम्मत के साथ डटे रहे। हालांकि इसके बाद नक्सलियों ने कभी यहां दोबारा उत्पात नहीं किया।

जागा प्रशासन पर वायदों आज भी पूरे नहीं


घटना के बाद जजावल में जल्द ही पुलिस कैम्प आरम्भ कर दिया गया। इस दौरान यहां पर समग्र विकास के लिए वायदे किये गए परंतु वे पूरे नहीं हुए। आवागमन के लिए बाधक रही जजावल घाट की कटिंग, पक्की सड़क, गांव में हायर सेकेंडरी स्कूल, यहां प्रवाहित बारहमासी बेंतो, जनवार नदी में सिंचाई के साधन, विद्युत सब स्टेशन, स्वास्थ्य सुविधा को बेहतर करने के वायदे किये गए। जिनमें कुछ पर काम भी किये गए जो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। पीएमजीएसवाई के तहत सड़क बनी जो जल्द ही उखड़ गई। घाट की कटिंग नहीं हुई लेकिन पक्की सड़क कुछ माह में खराब हो गई। हायर सेकेंडरी स्कूल, सब स्टेशन व सिंचाई की सुविधा पर आज तक कार्य नहीं हुए। इन सबसे अहम तो यह बात रही कि उस दौरान नक्सली के आतंक से जो भी बर्बादी हुई उसका मुवावजा आज तक पीड़ित परिवार को नहीं मिला। ऐसा नहीं कि प्रशासन की उपेक्षा यहां हमेशा से रही बल्कि जिले के ही तात्कालिक कलेक्टर जीआर चुरेन्द्र को इसकी जानकारी होने पर वे बकायदा यहां आते रहे और शिविर, चौपाल के माध्यम से ग्रामीणों को राहत देने का प्रयास भी किया। आज अगर नक्सलियों के मुखर विरोध का सम्मान गांव को देना चाहे तो यहां संभावनाएं भी पर्याप्त है। गांव के एक ओर बारह महीने बहने वाली बेंतो व जनवार नदी है जिससे सिंचाई की अच्छी व्यवस्था की जा सकती है। यही नहीं पूरा क्षेत्र जिसमें आसपास के कई गांव आते है, जलग्रहण क्षेत्र के लिए माकूल भौगोलिक पात्रता रखते है। यह दो विकासखंडों का सीमावर्ती जंगली क्षेत्र है जिसमें कई दूरस्थ व पिछड़े गांव भी आते है। इनमें शिक्षा, प्रशिक्षण, वनोपज संग्रहण जैसे बड़े कार्य करते हुए प्रत्यक्ष तौर पर ग्रामीणों को लंबे समय तक लाभ दिया जा सकता है। यदि यह संभावना है तो प्रशासन को भावनात्मक तौर पर भी अपनी दृष्टि इसपर जरूर रखनी चाहिए। यही ग्रामीण आदिवासियों के संघर्ष का सही सम्मान होगा।








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