जशपुर मुनादी।। यहां की मिट्टी से उठी एक ऐसी कहानी, जो सिर्फ खबर नहीं… एक संकल्प है, एक जुनून है, और एक मिसाल है।
“जब तक बनेगी गोशाला… नहीं बजेगी शहनाई!”
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के छोटे से गाँव तमता की रहने वाली बबली सिदार ने ऐसा ऐलान किया है, जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
आज के दौर में जहाँ सपने करियर और शादी के इर्द-गिर्द घूमते हैं, वहीं बबली ने अपनी ज़िंदगी का लक्ष्य बना लिया है—बेजुबानों की सेवा।
पिछले 7 वर्षों से, बबली सिदार उन पशु-पक्षियों के लिए उम्मीद की किरण बनी हुई हैं, जिनका कोई नहीं होता।
सड़क हादसों में घायल गाय, लावारिस पशु, या फिर बीमार पक्षी—सबके लिए बबली एक “संजीवनी” बन चुकी हैं।
शुरुआत उन्होंने बेहद साधारण तरीके से की—
जड़ी-बूटियों से इलाज।
गाँव-देहात की परंपरागत जानकारी को उन्होंने अपना हथियार बनाया और धीरे-धीरे पशुओं का इलाज करने में माहिर हो गईं।
आज स्थिति ये है कि
वह पशु चिकित्सा विभाग के साथ मिलकर काम कर रही हैं
घायल और बीमार जानवरों के इलाज में उनकी पहचान बन चुकी है
और अब उनका अगला बड़ा लक्ष्य है—एक बड़ी गोशाला का निर्माण
लेकिन इस लक्ष्य को उन्होंने सिर्फ सपना नहीं रखा…
इसे अपनी ज़िंदगी की शर्त बना लिया है।
बबली का साफ कहना है—
“जब तक गोशाला नहीं बनाऊंगी, तब तक शादी नहीं करूंगी।”
उनका यह प्रण सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि एक संदेश है—
कि अगर इरादा मजबूत हो, तो इंसान अपनी खुशियों से पहले भी समाज और जीवों के लिए खड़ा हो सकता है।
बबली सिदार न सिर्फ पशुओं का इलाज कर रही हैं, बल्कि
गाय को राष्ट्रीय माता बनाने के अभियान में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
आज बबली की कहानी सिर्फ जशपुर तक सीमित नहीं रही…
यह उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो कुछ अलग करना चाहते हैं, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाते।
एक लड़की… एक सपना… और अनगिनत बेजुबानों की उम्मीद।
यही है बबली सिदार की असली पहचान।