सतीश शर्मा की मुनादी।। हिंदू धर्म का सबसे पवित्र महीना श्रावण भगवान शिव को समर्पित होता है। इस पूरे मास में देश भर के श्रद्धालु शिव मंदिरों की ओर कांवड़ यात्रा करते हैं और पवित्र नदियों से जल लाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। यह आस्था, तप और भक्ति का ऐसा पर्व है जो भारत के कोने-कोने में बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
सुंदरगढ़ जिले में कांसबहाल के निकट स्थित घोघड़ धाम एक अत्यंत प्रसिद्ध शिव पीठ है, जहाँ श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को हजारों श्रद्धालु जल चढ़ाने हेतु पैदल यात्रा कर मंदिर पहुंचते हैं। पश्चिम ओड़िशा का यह प्रमुख शिव मंदिर न केवल स्थानीय श्रद्धालुओं का आस्था केंद्र है, बल्कि छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में “बोल बम” श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
भगवा वस्त्रधारी श्रद्धालु कांधे पर पवित्र जल भर कांवड़ रख बोल बम का जाप करते हुए पैदल शिव मंदिर की ओर चलते हैं।
घोघड़ मंदिर में जलाभिषेक के लिए भक्त वेदव्यास से अपनी पदयात्रा शुरू करते हैं। वेद व्यास धाम को व्यास मुनि की तपोभूमि माना जाता है। श्रद्धालु यहाँ शंख, कोयल और गुप्त सरस्वती नदियों के संगम से पवित्र जल लेकर लगभग 20 किलोमीटर की यात्रा कर कांसबहाल स्थित घोघड़ मंदिर पहुंचते हैं। बड़जोर नदी के तट पर स्थित यह मंदिर अपने शांत और आध्यात्मिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।
रास्ते और घोघड़ में होती है खान पान की निःशुल्क व्यवस्था
वेदव्यास से घोघड़ तक के रास्ते भर विभिन्न संस्थाओं द्वारा रविवार रात से सोमवार सुबह तक जगह-जगह निःशुल्क खान पान की व्यवस्था की जाती है. कई जगह भजन संध्या का कार्यक्रम भी आयोजित किया जाता है. कांवरियों के विश्राम तथा स्वास्थ्य सेवा भी संस्थाओं द्वारा मुहैया करायी जाती है. उसी तरह रविवार रात तथा सोमवार को घोघड़ धाम में भी निःशुल्क खान पान की व्यवस्था तथा स्वास्थ्य सेवा विभिन्न संस्थाओं द्वारा उपलब्ध करायी जाती है .
घोघड़ मंदिर परिसर में मुख्य शिव मंदिर के साथ-साथ हनुमान, दुर्गा, काली माता, भैरव बाबा, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण, राम दरबार, गणेश जी, आयप्पा स्वामी और भैरवनाथ के मंदिर भी हैं, जो श्रद्धालुओं को संपूर्ण धार्मिक अनुभूति कराते हैं।
मान्यता है कि यह मंदिर 19वीं शताब्दी में गांगपुर राजवंश द्वारा बनवाया गया था। कहा जाता है कि यहाँ भूमि से स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ था, जिसके बाद गांगपुर के राजा ने दो पुरोहित नियुक्त कर पूजा आरंभ करवाई। प्रारंभ में यह मंदिर टिन की छत वाला एक छोटा सा मंदिर था।
इस मंदिर में केवल भूइंया जनजाति के पुरोहित ही पूजा कर सकते हैं। वर्तमान में सात भूइंया परिवारों से संबंधित पुरोहित यहाँ पूजन-सेवा में लगे हैं।
पहले यंहा एक छोटा मंदिर हुआ करता था। फिर मंदिर के दोनों ओर राजगांगपुर और कांसबहाल में उद्योगों की स्थापना के बाद इस मंदिर के विकास की ओर भक्तों का ध्यान गया। 1987 में मंदिर का पुनर्निर्माण कर वर्तमान रूप प्रदान किया गया। 3 फरवरी 1987 को पुरी के शंकराचार्य ने नवनिर्मित मंदिर का उद्घाटन किया था। मंदिर की नियमित देखरेख और विकास हेतु 1999 "श्री घोघडेश्वर महादेव ट्रस्ट" की स्थापना हुई। पूर्व बीजेडी सरकार ने गत वर्ष मंदिर के विकास के लिए एक करोड़ सत्तर लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी, जिससे इस समय कई निर्माण कार्य किये जा रहे हैं।
श्रावण मास में यह शिवपीठ भक्तों से भर जाता है।
ट्रस्ट के प्रमुख हरिकिशन अग्रवाल कहते हैं कि इस दौरान पांच लाख से अधिक श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन हेतु यहाँ पहुँचते हैं।
अनेकों श्रद्धालू अपने परिवार के विवाह, मुंडन, जनेऊ धारण जैसे कार्यक्रम भी इसी मंदिर में कराते हैं।
पूरे सावन भर घोघड़ धाम में मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें झूलों सहित दूर-दराज से आये दुकानदार खान-पान, खिलौने, घरेलू सामान की दुकानें लगाते हैं।
पुलिस प्रशासन और ट्रस्ट मिलकर भक्तों की सुरक्षा, आपातकालीन सेवा और भीड़ नियंत्रण को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करते हैं।