जशपुर मुनादी ।। एनडीए के द्वारा राष्ट्रपति पद के लिए झारखण्ड के राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाये जाने को मोदी का मास्टर स्ट्रोक कहा जा रहा हो लेकिन एनडीए के इस फैसले का जशपुर में अलग तरहः का सियासी असर देखने को मिल रहा है।
द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाये जाने की घोषणा के बाद यहाँ का कांग्रेस आईटी सेल एकबारगी सक्रिय हो गया है और एनडीए के इस फैसले को छग और खाशकर जशपुर के साथ अन्याय बताने में लग गए हैं ।
इनका इशारा सीधे सीधे भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता नन्दकुमार साय की ओर है। इनका कहना है कि भाजपा के इस दिग्गज आदिवासी नेता की पुरी जिंदगी आदिवासियों की वकालत और उत्थान की पैरवी करने में लग गयी ।माना जा रहा था कि इस बार पार्टी इन्हें वर्षों की तपस्या का बड़ा ईनाम देगी लेकिन आखिरी वक्त में उंन्हे राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी से बिल्कुल अलग कर दिया गया ।
दरअसल नन्दकुमार साय ऐसे आदिवासी नेता हैं जिन्होंने देश मे आदिवासी राष्ट्रपति की पहली बार वकालत की थी और छग में वर्षो से आदिवासी मुख्यमन्त्री की मांग को दोहराते रहे हैं इसके लिए इन्हें पार्टी के बड़े नेताओं से बैर भी लेनी पड़ी और इसके राजनीतिक दुष्परिणामो का भी इन्हें सामना करना पड़ा ।इस बार कयास ये लगाए जा। रहे थे कि राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा अगर आदिवासी कार्ड खेलती है तो साय की राजनीतिक योग्यता और दक्षता को देखत्ते हुए इन्हें उम्मीदवार बना सकती है लेकिन ऐसा हुआ नहीं ।एनडीए ने द्रौपदी मुर्मू के नाम पर मुहर लगा दिया ।
ऐसे में भला कांग्रेस चुटकी लेने से बाज क्यों आये ।मौका देखकर चौका मारते हुए कांग्रेस ने भी सोशल मीडिया पर अलग तान छेडते हुए नन्दकुमार साय की सियासी गौरव गाथाओं का बखान करना शुरु कर दिया और आखिरी में लिखा कि राष्ट्रपति चुनाव में साय की अनदेखी छग और जशपुर के साथ छलावा है ।
हांलाकि भाजपा आईटी सेल भी इनका जवाब देने से नहीं चूक रही है।भाजपा ने कांग्रेस आईटी सेल के इस पोस्ट का जवाब देते हुए लिखा है कि नन्दकुमार साय कई बार के सांसद और कई बार के विधायक होने के अलावे राष्ट्रीय जनजाति आयोग के अध्यक्ष जैसे बड़े ओहदे पर रहने वाले नेता हैं ।पार्टी में रहकर इन्होंने कई सारे बड़े दायित्वो का निर्वहन किया है ऐसे में पार्टी में उनकी अनदेखी के सवाल कांग्रेस की कूटनीति के अलावे कुछ नहीं है ।