रायगढ़ मुनादी।। भारतीय संस्कृति, भाषा और ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से सामाजिक संगठन सुख-दुःख के साथी (विप्र परिवार) द्वारा संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेज़ी की निःशुल्क ऑनलाइन भाषा कक्षाओं के शुभारंभ की घोषणा को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में संगठन के पदाधिकारियों ने कार्यक्रम की रूपरेखा, उद्देश्य और समाज में इसकी आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। यह जानकारी संगठन द्वारा जारी कार्यक्रम विवरण के अनुरूप साझा की गई, जिसमें सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए निःशुल्क ऑनलाइन भाषा कक्षाओं की शुरुआत का उल्लेख है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत बार एसोसिएशन रायगढ़ के अध्यक्ष लालमणि त्रिपाठी, भाजपा के वरिष्ठ नेता सुभाष पाण्डेय, सुख-दुःख के साथी (विप्र परिवार) के अध्यक्ष सुरेश कुमार दुबे, समाज के वरिष्ठ सदस्य प्रशांत पाण्डेय तथा कार्यक्रम संयोजक भानु प्रताप मिश्र द्वारा पत्रकारों का स्वागत एवं अपने-अपने परिचय के साथ हुई। इसके पश्चात कार्यक्रम संयोजक भानु प्रताप मिश्र ने संगठन की ओर से प्रस्तावित निःशुल्क ऑनलाइन भाषा कक्षाओं की पूरी अवधारणा पत्रकारों के समक्ष विस्तार से रखी।
उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, ज्ञान और सभ्यता को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने का सबसे सशक्त आधार है। इसी उद्देश्य से सुख-दुःख के साथी (विप्र परिवार) द्वारा संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेज़ी जैसी तीन महत्वपूर्ण भाषाओं का निःशुल्क ऑनलाइन शिक्षण प्रारंभ किया जा रहा है, ताकि विद्यार्थी, युवा, महिलाएं, वरिष्ठजन तथा भाषा सीखने के इच्छुक सभी लोग घर बैठे इन भाषाओं का अध्ययन कर सकें। संगठन ने स्पष्ट किया कि इन कक्षाओं में प्रवेश के लिए किसी आयु सीमा का बंधन नहीं रखा गया है तथा इच्छुक व्यक्ति गूगल फॉर्म के माध्यम से पंजीयन कर सकते हैं।
भानु प्रताप मिश्र ने कहा कि भारतीय समाज का भविष्य तभी सुदृढ़ हो सकता है, जब नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। आधुनिक शिक्षा और तकनीक के इस युग में वैश्विक भाषा के रूप में अंग्रेज़ी का महत्व स्वीकार्य है, वहीं राष्ट्र की आत्मा और सांस्कृतिक चेतना को समझने के लिए संस्कृत और हिन्दी का अध्ययन भी उतना ही आवश्यक है। इसी सोच के साथ संगठन समाज के प्रत्येक वर्ग तक भाषा शिक्षा पहुँचाने का प्रयास कर रहा है।
प्रेस वार्ता के दौरान पत्रकारों ने विभिन्न विषयों पर प्रश्न पूछे, जिनमें सबसे प्रमुख प्रश्न संस्कृत भाषा की वर्तमान समय में उपयोगिता को लेकर रहा। इस पर कार्यक्रम संयोजक भानु प्रताप मिश्र ने विस्तार से उत्तर देते हुए कहा कि भारतीय दर्शन, संस्कृति और आध्यात्मिक चिंतन की संपूर्ण आधारशिला संस्कृत भाषा पर आधारित है। भारत के महान ग्रंथ—वेद, ब्राह्मण, अरण्यक, उपनिषद, वेदांग, स्मृतियाँ तथा महाकाव्य—सभी मूल रूप से संस्कृत में रचित हैं। इन ग्रंथों ने केवल धार्मिक और आध्यात्मिक विचार ही नहीं दिए, बल्कि भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक परंपराओं और ज्ञान-विज्ञान की भी नींव रखी है।
उन्होंने कहा कि यदि नई पीढ़ी संस्कृत से दूर होती चली जाएगी तो वह अपने मूल ज्ञान-स्रोतों से भी दूर हो जाएगी। इसलिए संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत तक पहुँचने का माध्यम है। संस्कृत का अध्ययन भारतीय चिंतन, दर्शन, साहित्य और संस्कृति को समझने के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना प्राचीन काल में था। आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने के लिए संस्कृत का संरक्षण और अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
हिन्दी भाषा के संबंध में पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि हिन्दी हमारी मातृभाषा होने के साथ-साथ देश के व्यापक जनसमूह को जोड़ने वाली व्यवहारिक भाषा है। दैनिक जीवन के कार्यों, सामाजिक संवाद, प्रशासन, साहित्य, पत्रकारिता और राष्ट्रीय एकता के क्षेत्र में हिन्दी की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि समाज शुद्ध और प्रभावी हिन्दी बोलने तथा लिखने की आदत विकसित करता है, तो संचार अधिक स्पष्ट, सुसंगत और प्रभावी बन सकता है। हिन्दी समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने का कार्य करती है और सामाजिक समरसता को भी मजबूत करती है।
अंग्रेज़ी भाषा की उपयोगिता पर भी चर्चा करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आज के वैश्विक परिवेश में शिक्षा, व्यवसाय, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय संचार के लिए अंग्रेज़ी का ज्ञान भी आवश्यक है। इसलिए संगठन ने तीनों भाषाओं—संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेज़ी—को समान महत्व देते हुए इनके लिए अलग-अलग विशेषज्ञों द्वारा ऑनलाइन कक्षाओं की व्यवस्था की है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी बताया गया कि इन कक्षाओं का उद्देश्य केवल भाषा सिखाना नहीं, बल्कि भाषा के माध्यम से संस्कृति, व्यक्तित्व विकास और प्रभावी संचार कौशल का निर्माण करना है। संगठन का विश्वास है कि भाषा का ज्ञान व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाता है तथा समाज और राष्ट्र के प्रति उसकी समझ को भी व्यापक बनाता है।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित पत्रकारों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे समाजोपयोगी और समय की आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब लोग अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे प्रयास समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य रूप से बार एसोसिएशन रायगढ़ के अध्यक्ष लालमणि त्रिपाठी, सुख-दुःख के साथी (विप्र परिवार) के अध्यक्ष सुरेश कुमार दुबे, भाजपा के वरिष्ठ नेता सुभाष पाण्डेय, समाज के वरिष्ठ सदस्य प्रशांत पाण्डेय, कार्यक्रम संयोजक भानु प्रताप मिश्र, विनय मिश्र, अनुदीप मिश्र, सुरेन्द्र पाण्डेय, ऋषि पाण्डेय, अवधमणि तिवारी, गुडकेश त्रिपाठी, अर्चित दुबे, पिन्टू दुबे सहित संगठन के अनेक सदस्य एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
संगठन के अध्यक्ष सुरेश दुबे के नेतृत्व में होने वाले इस कार्यक्रम के अंत में भानु प्रताप मिश्र ने संगठन के पदाधिकारियों, सदस्यों और सभी पत्रकार बधुंओं का आभार व्यक्त करते हुए समाज के विद्यार्थियों, युवाओं, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों से अधिक से अधिक संख्या में इन निःशुल्क ऑनलाइन भाषा कक्षाओं से जुड़ने का आह्वान किया गया, ताकि भाषा के माध्यम से भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और संवाद कौशल को नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुँचाया जा सके।