जशपुर मुनादी।। कुनकुरी में मोहर्रम के दौरान जो तस्वीर सामने आई, वह चर्चा का विषय बन गई है। छत्तीसगढ़ भाजपा के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव की प्रतिमा के ठीक सामने भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मोहर्रम जुलूस में शामिल लोगों का स्वागत किया, उन्हें जलपान कराया और कोल्ड ड्रिंक भी वितरित की। जिस आयोजन को कुछ लोग हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द की मिसाल बता रहे हैं, उसी पर अब स्थानीय सोशल मीडिया में तीखी बहस छिड़ गई है।
कुनकुरी, जो मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र होने के कारण प्रदेश की सबसे संवेदनशील और वीआईपी सीटों में गिना जाता है, वहां मोहर्रम इस बार प्रशासन के लिए भी बड़ी चुनौती था।
दरअसल, वर्ष 2024 में मुस्लिम समुदाय के भीतर आपसी विवाद के कारण मोहर्रम का जुलूस नहीं निकल पाया था ।इस बार भी समाज के भीतर विवाद की स्थिति उतपन्न हो गई थी ऐसे में इस बार प्रशासन की प्राथमिकता थी कि त्योहार पूरी शांति और भाईचारे के साथ सम्पन्न हो। सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गयी और सभी पक्षों से सहयोग भी लिया गया।
इसी दौरान भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जुलूस का स्वागत किया। जलपान और कोल्ड ड्रिंक वितरित किए गए। भाजपा समर्थकों का कहना है कि इसका उद्देश्य केवल सामाजिक सद्भाव और आपसी विश्वास को मजबूत करना था।
लेकिन इसके बाद स्थानीय सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। कुछ लोगों ने भाजपा के इस कदम की आलोचना करते हुए इसे हिंदुत्व की विचारधारा के खिलाफ बताया। उनका कहना है कि इस तरह के कदम से समुदाय विशेष को बढ़ावा देने का संदेश जाता है। स्थानीय सोशल मीडिया ग्रुप में अबतक इस मसले पर चर्चा खत्म नहीं हुई है जबकि मोहर्रम बीते आज 5 दिन हो गए । चर्चा के दौरान कई लोग ग्रुप में भाजपा नेताओ के द्वारा मुस्लिम समाज के लोगो का इस्तकबाल किया जाना हजम नहीं हो रहा है और भाजपा को घेरने के चक्कर मे ऐसे पोस्ट भी किये जा रहे है जिससे हिंदुत्व कितना मजबूत होगा यह तो नहीं पता लेकिन कुनकुरी का आपसी सौहार्द जरूर खतरे में पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है ।
दूसरी ओर बड़ी संख्या में लोग इस सोच से असहमत भी दिखाई दिए। उनका कहना है कि किसी धार्मिक जुलूस में शांति, सुरक्षा और सद्भाव के लिए सहयोग करना किसी भी लोकतांत्रिक समाज की सामान्य परंपरा है। उनके अनुसार ऐसे मुद्दों को धार्मिक टकराव का रूप देना सामाजिक सौहार्द के लिए ठीक नहीं है।
अब यह मामला केवल सोशल मीडिया की बहस तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि धीरे-धीरे राजनीतिक रंग भी लेने लगा है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल राजनीति नहीं, बल्कि सामाजिक शांति का है।
आखिर क्या किसी धार्मिक आयोजन में दूसरे समुदाय का स्वागत करना भाईचारे की मिसाल है, या फिर यह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जाना चाहिए? इस पर अलग-अलग राय हो सकती है। लेकिन इतना जरूर है कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में मतभेद अपनी जगह हैं और सामाजिक सौहार्द अपनी जगह।
बहरहाल, क्या भाजपा का यह कदम सामाजिक सद्भाव को मजबूत करता है या इस पर उठ रहे सवाल जायज़ हैं?