जशपुर (गौरव सिन्हा) मुनादी। इन दिनों जशपुर और सरगुजा के आदिवासी अंचलों में हर गांव में एक त्यौहार की धूम दिख रही है, जिसे "महादेव" पूजा के नाम से जाना जाता है। ये आदिवासियों की वो पूजा पद्धति है जो गांव की खुशहाली के लिए जाता है। धुन और थाप वो पड़ती है कि आदमी वहीं मदमस्त झूमने लगता है। दरअसल ये आदिवासियों का वो साधारण नाच गाना नहीं, बल्कि इसमें धर्म और आध्यात्म से जुड़ने की वो पध्दति है, जिसे "महादेव" के नाम से जाना जाता है।
इस पूजा में खास बात यह है कि इसके नृत्य स्टेप सबसे अलग थाप जो कानो में गूंजती है, वो उसे झूमने या झुपने पर मजबूर कर देती है। जो सीधे आध्यात्म से जुड़ जाता है, ऐसी ही पूजा एक इन दिनों जशपुर के बग़ीचा में चल रही है। हमने कोशिश की है कि इस पूजा के हर पहलू को छुएं, और उस त्यौहार को समझें, कि जो सदियों से इनके रीति रिवाज, परम्परा, संस्कृति के साथ आध्यात्म में कैसे शामिल है। जिसे हिन्दू आदिवासी परिवार बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं।
महादेव पार्वती की होती है पूजा और उनकी की जाती है शादी
दरअसल ये पूरी पूजा महादेव पार्वती की होती है, जिसमे महादेव और पार्वती की पूजा होती है, या कहें तो इस त्यौहार में महादेव पार्वती की शादी होती है, जिसमे तीन साल लग जाते हैं। पहले साल में शिव पार्वती की मंगनी की जाती है, दूसरे साल में बरोखी या तेल की रस्म होती है, और तीसरे साल शादी रस्म के रूप में होती है। इसके अगले 3 साल तक सब कुछ बंद रहता है। तीसरे साल के बाद फिर से सिलसिला प्रारम्भ हो जाता है। इसमे बात यह भी की पूजा में दूसरे साल बरोखी में तेल का उपयोग होता है, जिसका सभी को रंग की तरह लगया जाता है, वहीं तीसरे साल शादी में तेल और हल्दी दोनों का उपयोग होता है तथा रग की तरह उपस्थित लोगों को लगाया जाता है।
कब होता है यह त्यौहार.?
खास बात यह भी की जब गांव के लोग धान वगैरह काट लेते हैं, फसल उनके घर पहुंच जाती है तो इस त्यौहार को लग्न और मुहर्त देखकर शुरू किया जाता है, सबसे पहले गांव के लोग ढोल बाजे के साथ जाकर एक खास जगह होती है वहां जाकर मिट्टी की पूजा और न्योता दिया जाता है। दूसरे दिन सभी उसी तरह ढोल नगाड़े लेकर मिट्टी निकालते हैं, और उससे शिव पार्वती की मूर्ति बनाई जाती है। खास बात यह भी कि उस मिट्टी को हड़िया (राइस बियर) से साना जाता है और उसमें पानी का प्रयोग नहि होता है। उससे मूर्ति बनाई जाती है।
कुंवारी कन्याएं ही शिव पार्वती की मूर्ति को गांव लेकर आती है..
इस मूर्ति को कुंवारी कन्याएं जो 10-12 साल की होती है वो नाचते हुए गांव लाती है, शिव पार्वती की इस मूर्ति को शादी शुदा लोगों को छूने की इजाजत नहि होती। यह त्यौहार 3-4 दिन लगातार चलता है, खास बात यह भी की पूजा बैगा करते हैं, और इसमे उस बैगा का सीमा क्षेत्र होता है उस सीमा क्षेत्र में जितने भी बस्ती होते हैं, सभी सम्मिलित होते हैं। और हर रोज अलग अलग बस्तियों में इस मूर्ति को अलग अलग जगह बिठाया जाता है, और वहां नाच गाना के साथ पूजा होती है। यह नाच गान इन दिनों लगातार अनवरत चलता रहता है।
कैसे होती है पूजा, क्या है मान्यता..
जिस बस्ती में शिव पार्वती नुमा इस मूर्ति को रखा जाता है, वहां के लोग घर से धान लेकर आते हैं, और शिव पार्वती की पूजा की जाती है। सबसे खास बात इसमे यह भी कि मूर्ति को धान के ऊपर ही बिठाया जाता है। पूजा पश्चात बैगा उस धान में से पांच अंजुली धान पूजा करने वालो को देता है, जिसे आँचल में लिया जाता है, और उस धान को पोटली बनाकर अपने भंडार या कोठीघर या कहले तो जहां अनाज रखा जाता है, वहाँ शिव पार्वती के आशीर्वाद स्वरूप इस पांच अंजुली धान को रखा जाता है। जो मान्यता अनुसार उन धन धान्य से पूर्ण रखता है। इस तरह पूजा होते चार दिनों बाद वापस जहां से मिट्टी निकाला गया रहता है, उसी नाच गान पूजा के साथ विसर्जन कर दिया जाता है।

