
ग्राउंड जीरो से मुकेश गोयल की विशेष रिपोर्ट
प्रतापपुर मुनादी।। लॉकडाउन के दौरान हाथियों के व्यवहार में परिवर्तन का दावा करने वाली भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून के एक रिसर्चर का दूसरा दावा भी बेबुनियाद निकला। रिसर्चर के दावे के मुताबिक इंसानों के जंगल नहीं जाने से हाथी अब काफी शांत हो गए है। वे धूल मिट्टी से खेल रहे है। वे पहले की तुलना में घरों को कम क्षति पहुंचा रहे है। अब इंसान लॉकडाउन के कारण सायंकाल घरों में बन्द हो जाते है तो हाथी भी बस्ती के तरफ नहीं आ रहे है जिससे क्षति कम हो रही है। यह दावा उस संस्थान ने किया है जिसके साथ छत्तीसगढ़ वन विभाग के आला अधिकारियों ने 3 वर्ष का एमओयू किया है। यह करार जुलाई 2017 में किया गया था। जिसमें यह संस्थान हाथी के व्यवहार, प्रसार के साथ हाथी व इंसान के परस्पर प्रभाव पर एक प्रभावशाली प्रबंधन का शोध करते हुए रिपोर्ट छत्तीसगढ़ वन विभाग को दे रहा है। जो हाथी प्रभावित क्षेत्र में विभाग के काम आएगा। इस कार्यक्रम के तहत संस्थान का दावा है कि वह अपनी दो रिपोर्ट छत्तीसगढ़ वन विभाग को दे चुकी है,जबकि तीसरे सत्र का शोध जारी है। इसी तारतम्य में हाल ही में अम्बिकापुर रह रहे इस संस्थान के एक रिसर्चर ने लॉक डाउन के दौरान हाथियों के व्यवहार में अप्रत्याशित परिवर्तन का दावा किया और इसे कई समाचार पत्रों में सुर्खियों के साथ प्रकाशित भी कराया। "मुनादी" ने इन्ही दावों को लेकर अपनी पड़ताल की तो संस्थान के पूरे दावे खोखले निकले। "मुनादी" ने अपने 25 अप्रैल की अंक में फसल की कम क्षति का दावा व इसकी सच्चाई प्रमुखता के साथ आपके समक्ष सामने लाई थी। आज संस्थान के द्वारा दूसरे दावे की पोल खोलता हुआ यह दूसरी रिपोर्ट प्रस्तुत है।
दावा--इंसान घर पर लॉकडाउन, बस्ती नहीं आ रहा गजदल।

संस्थान के प्रतिनिधि के दावे के अनुसार इंसान जंगल नहीं जा रहे है इससे हाथी का व्यवहार शांत हो गया है और बस्ती के तरफ नहीं आ रहे है। जबकि सच्चाई यह है कि इंसान व हाथी के बीच लॉकडाउन के दौरान भी द्वंद जारी है। पहले व आज भी ग्रामीण, हाथी की मौजूदगी में प्रायः जंगल जाने से बचते रहे है। जब भी ग्रामीणों को यह पता चलता है कि गजदल पास के जंगल में मौजूद है तो वे जंगल जाते ही नहीं थे। जंगल में इंसानों की हाथी से मुठभेड़ या तो अनजाने में या फिर जंगल के मुख्य मार्ग से न आकर पगडंडी से जंगल पर जाने पर हादसे हुए है। गजदल हमेशा सायं 4-5 बजे के दरमियान ही जंगल से बाहर बस्ती की ओर आते है। अभी भी यह गजदल उसी अवधि में ही जंगल से बाहर आ रहे है। गजदल के आसपास रहने की सूचना पर आज भी किसान फसल को बचाने का प्रयास कर रहे है। इसके लिए वन विभाग की टीम के साथ किसान फसल को बचाने के लिए हाथियों को जंगल की ओर खदेड़ने को मजबूर है। रही बात हाथी के बस्ती के पास आने की तो आज भी इस गजदल में मौजूद प्यारे हाथी व एक अन्य नर हाथी तो दल को छोड़कर बस्ती में प्रवेश कर रहे है, जिससे जनक्षति की भी संभावना बढ़ गई है। हाथी जंगल छोड़ धान, महुआ खाने बस्ती पहुंच जा रहे है। आज भी 15 हाथियों का दल डुमरिया बीट के बुंदिया के पास ठहरा हुआ है, जो रात होते ही सोनगरा सर्किल में आकर खेतों में तबाही मचा रहे है, जिसको बचाने के लिए ग्रामीण गजराज वाहन में तैनात कर्मचारियों के साथ रात भर फसल का पहरा दे रहे है।
दावा--घरों की क्षति कम जबकि वास्तविकता कुछ और।

भारतीय वन्यजीव संस्थान के प्रतिनिधि का दावा है कि लॉकडाउन के दौरान हाथी शांत हो गए है और पहले की अपेक्षा घरों को कम क्षति पहुंचा रहे है। इस दावे की पोल उन आंकड़ों से भी खुल रही है कि लॉकडाउन के पहले से भी गजदल ने मकानों की क्षति कम पहुंचाई थी। दरअसल इसके पीछे पूरी मेहनत गजराज वाहन में तैनात वनकर्मी व अन्य सहयोगियों की है, जो हाथी की मौजूदगी वाले क्षेत्र में सायंकाल ही पहुंच जाते है और हाथी के निकलने के साथ ही यह गजदल के समीप वाहन के साइरन के साथ हाथियों को बस्ती की ओर आने से रोकने का प्रयास करते है। इस दौरान ग्रामीणों की उपस्थिति भी मदद के लिए मौजूद रहती है। इस गजराज वाहन की सक्रियता से ही पिछले कुछ माह में मकानों की क्षति में अप्रत्याशित कमी आई है। इसके पीछे लॉकडाउन का दावा भी पूरी तरह खोखला है। अगर लॉकडाउन के दौरान अलग-अलग दलों में विचरण कर रहे गजदल का विश्लेषण करें तो सच्चाई खुद ब खुद सामने आ जायेगी।
गजराज वाहन व दल की अहम भूमिका।

15 हाथियों का प्यारे दल लॉकडाउन के समय ही प्रतापपुर परिक्षेत्र में प्रवेश किया था, तब से इस पर लगातार गजराज वाहन की नजर है, जिसका परिणाम यह निकला कि यह दल धरमपुर सर्किल से लेकर खड़गवां व सोनगरा सर्किल में एक भी घर को क्षति नहीं पहुंचा सका। जबकि टुकुडांड़ में भ्रमण कर दो नर दंतैल ने एक माह पूर्व एक घर तो बहरादेव ने गणेशपुर में 15 दिन पहले एक घर को क्षतिग्रस्त किया था, क्योंकि उस दौरान गजराज वाहन वहां मौजूद नहीं था। इसी प्रकार घुई परिक्षेत्र में 12 हाथी के दल ने पिछले दो दिनों से तबाही मचाई हुई है। यहां 4 दिन पूर्व ही इस दल ने शरण यादव, रामसूरित यादव, मोहन यादव के घर को क्षतिग्रस्त किया था, क्योंकि यहां भी गजराज वाहन व इसकी टीम मौजूद नहीं थी। इस मामले के अलावा 23 अप्रैल की रात हाथियों का दल प्रतापपुर परिक्षेत्र से निकलकर सूरजपुर के डुमरिया बीट पहुंचा था। यहां भी गजराज वाहन व टीम के नहीं होने से हाथियों ने बुंदिया के रवांडीह में दो मकानों को क्षतिग्रस्त किया। पूरे हालत पर नजर डाले तो यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि सभी हाथियों से विभाग उतना चिंतित नहीं है, जितना कि प्यारे नर हाथी की मौजूदगी से। बेहद आक्रामक इस नर हाथी ने कई इंसानों की जान ली है। इसके खड़गवां, सोनगरा सर्किल में मौजूदगी के बाद भी कोई जनहानि नहीं हुई है तो उसके पीछे गजराज वाहन व दल की सक्रियता ही है। इसको लेकर देहरादून की संस्थान भले जो भी दावा करे परंतु सच्चाई यही है।

अंत मे कुछ सवाल
1. आखिर वाईल्डलाईफ के कई बड़े अधिकारियों को इस संस्थान की गतिविधियों की जानकारी क्यों नहीं है ?
2. संस्थान की वास्तविक गतिविधि जानने के बाद भी विभाग का मैदानी अमला चुप्पी साधे हुए हैं आखिरकार क्यों ?
अभी जारी है संस्थान के कई अन्य खुलासे, पढ़ते रहिये मुनादी डॉट कॉम.....

