मुकेश गोयल की रिपोर्ट
प्रतापपुर मुनादी।। जजावल कैम्प में शरण दिए गए झारखंड के 97 मजदूर अब हताश होने लगे है। पहले राजनांदगांव और अब जजावल में दो बार क़्वारेंटाइन की अवधि पूर्ण कर रहे मजदूरों को अब खेती की चिंता सताने लगी है। वे लगातार अपने क्षेत्र के प्रधान, विधायक से संपर्क करने का प्रयास कर रहे है, ताकि उन्हें राहत कैम्प से वापस झारखंड लाने की पहल की जा सके। उनका मानना है कि अब यदि घर पहुंचने में देरी हुई तो वर्ष भर खेती से चलने वाली आजीविका भी प्रभावित हो जाएगी, जिससे उनके सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो जाएगा।
देश में लॉकडाउन के बाद अभी व बाद में रोजी रोटी का संकट सबसे ज्यादा अन्य क्षेत्रों में काम कर रहे मजदूरों के सामने आ गया है। प्रतापपुर के जजावल राहत कैम्प में जिला प्रशासन की पहल पर शरण दिए गये 97 मजदूरों के सामने भी भविष्य को लेकर चिंता है। जजावल राहत कैम्प में ठहराए गए मजदूर में से कई मजदूर महाराष्ट्र के नागपुर में निर्माणाधीन एम्स में लेबर का कार्य कर रहे थे। इन मजदूरों के मुखिया राजनाथ गरवा ने बताया कि लॉकडाउन के बाद वहां से 60 मजदूर अपने घर झारखंड के लिए निकले थे,जिन्हें प्रशासन ने 30 मार्च को राजनांदगांव में रोक लिया। और उन्हें ग्राम छुरिया के राहत शिविर में रखा गया। यहां पर उन्हें 14 दिन के क़्वारेंटाइन पूरा कर लिया । इस दौरान यहां पर मजदूरों ने उन्हें झारखंड छोड़ने का आग्रह किया तो प्रशासन ने उन्हें छत्तीसगढ़-झारखंड की सीमा तक छोड़ने की बात कहते हुए रवाना कर दिया। राजनाथ ने बताया कि सभी मजदूर इस बात से खुश थे कि जल्द ही वे झारखंड अपने घर पहुंच जाएंगे। वे लोग इस बात को लेकर निश्चिंत थे उन्होनें अधिकारियों के कहे अनुसार अपने 14 दिन का क़्वारेंटाइन अवधि को भी पूर्ण कर लिया है, किसी भी मजदूर में कोरोना के कोई भी लक्षण नहीं है, इसलिए उन्हें घर तक छोड़ दिया जाएगा। मजदूर राजनाथ ने बताया कि उन्हें राजनांदगांव के अधिकारियों ने झारखंड की सीमा तक छोड़ने का आश्वासन देते हुए वहां से रवाना कर दिया, लेकिन प्रतापपुर क्षेत्र में पहुंचकर उन्हें पता चला कि उन्हें प्रतापपुर के जजावल क्षेत्र ले जाया जा रहा है। उनलोगों ने जजावल पहुंचकर अधिकारियों से चर्चा भी की कि उन्हें छत्तीसगढ़ व झारखंड की सीमा में छोड़ने का भरोसा दिलाया गया था। इस पर यहां के अधिकारियों ने बताया कि लॉकडाउन आगामी 3 मई तक बढ़ गया है, इसलिए उन्हें यहां रहना पड़ेगा। साथ ही उन्होनें बताया कि मजदूरों को झारखंड सीमा पर छोड़े जाने का उनके पास कोई आदेश नहीं है, इसलिए उन्हें यहीं रहना पड़ेगा। जब आदेश आएगा तो उन्हें सीमा तक छोड़ दिया जाएगा।
खरीफ फसल तैयारी की चिंता।
राजनाथ ने बताया कि पहले तो कोरोना की वजह से उनकी रोजी रोटी छीन गई, लेकिन अब समय पर घर नहीं पहुंच पाने से साल भर की खेती बाड़ी पर भी असर पड़ सकता है। उसने बताया कि घर में थोड़ी बहुत खेती के लिए परिवार के सभी सदस्य मिलकर तैयारी करते है, जिससे साल भर के लिए अनाज घर में हो सके। ज्यादातर परिवार के युवा बाहर रोजगार की तलाश में निकल जाते है, इसलिए घर में मौजूद बच्चे, महिला व बुजुर्ग खरीफ की तैयारी के लिए उनका इंतजार करते है। ऐसे में ज्यादातर युवा छुट्टी लेकर वापस घर आते है और फसल की तैयारी कराते है। अब इस नए संकट से वे घर नहीं जा पा रहे है, जिससे परिवार तो परेशान है ही साथ में खेती के भी पिछड़ने के आसार बढ़ गए है।
सर्टिफिकेट दिलवा दीजिये साहब।
लॉकडाउन के कारण पहले राजनांदगांव व अब जजावल में क़वारेंटाइन की अवधि बिता रहे मजदूर अभी भी सशंकित है। राजनाथ ने बताया कि मजदूर पहले 14 दिन राजनांदगांव क़्वारेंटाइन में समय बिताए अब 14 दिन जजावल में समय बिता रहे है। कहीं ऐसा न हो कि उन्हें यहां से जाने के बाद बॉर्डर या घर में क़्वारेंटाइन कर दिया जाए। इसलिए साहब हम मांग करते है कि हम लोगों को चिकित्सा जांच के बाद यहां से सर्टिफिकेट दे दिया जाए कि हम सभी स्वस्थ्य है, नहीं तो वहां पहुंचकर भी हमलोग परेशान हो जाएंगे। राजनाथ ने कहा कि जजावल कैम्प में उनके अच्छा खाने रहने की व्यवस्था है, लेकिन घर की चिंता से सब बेकार लग रहा है।
अभी कोई निर्देश नहीं--एसडीएम
14 दिन की क़्वारेंटाइन अवधि पूर्ण होने के बाद मजदूरों को झारखंड छोड़े जाने के सवाल पर प्रतापपुर एसडीएम सीएस पैकरा ने बताया कि लॉकडाउन की अवधि 3 मई तक की है। अभी मजदूरों को कैम्प से झारखंड तक छोड़े जाने का कोई निर्देश नहीं मिला है। जैसे ही निर्देश आएंगे उसके अनुरूप आगे कार्य किया जाएगा। उन्होनें कहा कि मजदूरों के लिए खाने व रहने की अच्छी व्यवस्था है। उन्हें लागातार समझाया जा रहा है कि वे धैर्य के साथ लॉकडाउन का पालन करे। प्रशासन उनकी हर संभव मदद करने को तत्पर है।

