मुकेश गोयल की खास रिपोर्ट
प्रतापपुर मुनादी ।। हिन्दू मान्यता के अनुसार किसी इंसान के दाह संस्कार उपरांत अस्थि का विसर्जन गंगा नदी के तट पर किया जाता है। कोरोना के कहर ने इंसान से यह हक भी छीन लिया है। अब प्रतापपुर नगर सहित आसपास क्षेत्र के लोग अपने किसी परिजन की मृत्यु के बाद दाह संस्कार तो निर्धारित स्थान पर कर ले रहे हैं, लेकिन उनकी अस्थि का विसर्जन उन्हें अपने आसपास की नदी में करना पड़ रहा है। प्रतापपुर नगर में भी पिछले कुछ दिनों में हुई मौत के बाद लोगों ने अस्थि का विसर्जन केरता-खड़गवां के मध्य प्रवाहित होने वाली महान नदी में करना पड़ा।
हिन्दू संस्कृति में संस्कारों को लेकर कहीं कोई चूक या फेर बदल करने की अनुमति नहीं है। हर कोई इन संस्कारों को यथासंभव विधि विधान से करना चाहता है। इन्हीं में से एक संस्कार अंतिम संस्कार व अस्थि विसर्जन भी पूरे नियम-कानून से करने की मान्यता है, लेकिन कोरोना संक्रमण काल ने इन धार्मिक मान्यताओं को भी बदल कर रख दिया है। प्रतापपुर नगर ही नहीं आसपास के विभिन्न क्षेत्र में मृतकों के परिजन शव के अंतिम संस्कार के बाद अस्थि को आसपास की नदी में विसर्जित कर रहे है। प्रतापपुर नगर में भी लॉकडाउन के बाद हुई मौतों के बाद परिजन को अस्थियों का विसर्जन केरता-खड़गवां के मध्य महान नदी में करना पड़ रहा है। कोरोना व लॉकडाउन के दौरान हुई मौतों के बाद इस मजबूरी पर मृतक के परिजन कहते है कि सभी नदियां कहीं न कही मां गंगा में विलीन होती है इसलिए मन को तसल्ली देने के लिए अंतिम संस्कार की इस प्रक्रिया को क्षेत्र की सबसे बड़ी नदी महान में करते हुए संस्कार को पूर्ण किया जा रहा है। लोगों ने यह भी कहा कि जब अंतिम संस्कार के लिए 20 लोगों के शामिल होने का निर्धारण कर दिया गया है तो मां गंगा में भी अस्थि विसर्जन के लिए कुछ नियमों का निर्धारण करते हुए सुविधा दी जानी चाहिए, ताकि वर्षों से चले आ रहे इस अंतिम संस्कार के विधान को विधि विधान से पूर्ण किया जा सके।

