27-April-2020


Munaadi Breaking:-सरगुजा सर्किल में अध्ययन के लिए हाथी पर लगाए गए लगभग सभी रेडियो कॉलर गिरे.....हवा में अध्ययन कर रही है संस्था ? अध्ययन की उपयोगिता पर उठे सवाल



ग्राउंड जीरो से मुकेश गोयल की खास रिपोर्ट

मुनादी ने लगातार दूसरे दिन 26 अप्रैल के अंक में प्रमुखता से उठाया हाथियों के व्यवहार में परिवर्तन का दावा

प्रतापपुर मुनादी।। उत्तर छत्तीसगढ़ में हाथियों पर शोध करते हुए बेहतर प्रबंधन की रिपोर्ट देने के लिए छत्तीसगढ़ वन विभाग से करार करने वाली संस्थान भारतीय वन्यजीव संस्थान अपने अभियान की शुरुवात में ही विफल हो चुकी है। हाथियों पर शोध के लिए शुरू में आवश्यक अलग-अलग दल का नेतृत्व करने वाले हाथी पर बेहद खर्चीले लागत वाले लगाए गए रेडियो कॉलर भी गिर चुके है तो संस्था कौन से आंकड़े इकट्ठा करके इसका अध्ययन कर रही है ? सवाल यह भी उठता है कि पिछले 33 माह तक शोध करने के बाद आखिर संस्थान ने ऐसा कौन सा फार्मूला छत्तीसगढ़ सरकार को सुपुर्द किया है जिसका क्रियान्वयन करते हुए सरकार को इससे हाथी प्रभावित क्षेत्र में कोई मदद मिली हो ? जानिए पूरी रिपोर्ट।

मुनादी के पहले दिन 25 अप्रैल के अंक में प्रमुखता से उठाया गया मुछा

वर्ष 2017 में उत्तर छत्तीसगढ़ में हाथियों के बढ रहे उत्पात को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने इसके प्रबंधन के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना बनाई। उस दौरान सत्ता में भाजपा की सरकार थी, जिसने हाथियों से होने वाली क्षति को देखते हुए देहरादून की संस्था भारतीय वन्यजीव संस्थान से एक करार किया। यह करार जुलाई 2017 में किया गया। इसके अनुसार उक्त संस्थान को हाथियों के व्यवहार,रहवास, विचरण सहित आये दिन हाथी व इंसान के द्वंद पर एक व्यापक अध्ययन रिपोर्ट तैयार करना था। जिसे छत्तीसगढ़ सरकार को दिया जाना था, जिसका उपयोग कर सरकार हाथी प्रभावित क्षेत्र में हाथी के प्रभाव को कम करते हुए इसका लाभ ग्रामीणों को दे सके। इसमें पूरे क्षेत्र में भ्रमण करने वाले अलग-अलग गजदल की मौजूदगी, उसका विचरण क्षेत्र, उस दल का स्वभाव व इंसानों को लेकर व्यवहार का अध्ययन था। इसमें इस बात पर भी जोर दिया गया था कि हाथी प्रभावित क्षेत्र में ग्रामीणों को जागरूक करते हुए हाथी से बचाव व वन विभाग के मैदानी अमले को इसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षित कर उन्हें इस योग्य बनाना था कि यह अमला हाथी से होने वाली क्षति को कम करते हुए प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों की मदद कर सके। इसमें धनक्षति के साथ अहम मानवक्षति को रोकना प्रमुख था। इसके लिए इस संस्थान को सबसे पहले उत्तर छत्तीसगढ़ में विचरण कर रहे अलग-अलग गजदल की हर गतिविधि का अध्ययन करना था ताकि इस आधार पर वे किसी निर्णय पर पहुंच सके। इसके लिए इस संस्थान को शुरुवाती अध्ययन के बाद सबसे पहले अलग-अलग गजदल के मुखिया हाथी में रेडियो कॉलर लगाने की प्रक्रिया को आरम्भ करना था ताकि उनके झुंड की पूरी रिपोर्ट सामने आ सके, जिससे अध्ययन करने में आसानी हो। संस्थान ने इसके लिए पांच हाथियों पर रेडियो कॉलर लगाया भी, लेकिन बावजूद इसके यह अभियान कितना सफल है यह स्पष्ट न हो सका। इसमें सबसे मजेदार बात यह रही कि एक के बाद एक हाथी में लगाये गए रेडियो कॉलर गिरते रहे और संस्था इसके बगैर अध्ययन करती रही। बगैर रेडियो कॉलर के आखिर संस्थान ने हाथियों का अध्ययन कैसे कर लिया ? प्रस्तुत है इसकी रिपोर्ट---

पांच हाथी पर लगाये गए रेडियो कॉलर

मिली जानकारी के अनुसार भारतीय वन्यजीव संस्थान के प्रोजेक्ट टीम में शामिल वन्यजीव वैज्ञानिकों ने सबसे पहले क्षेत्र में भ्रमण कर रहे अलग-अलग गजदल का अध्ययन किया। इसके बाद वैज्ञानिकों ने इनमें से कुछ हाथियों का चयन करते हुए उन्हें रेडियो कॉलर लगाना आरम्भ किया। संस्था की ही दूसरे वर्ष की प्रोजेक्ट रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार संस्था ने सबसे पहले 12 मई 2018 को अकेले विचरण कर रहे 40 वर्षीय नर हाथी बहरादेव को रेडियो कॉलर लगाया। यह अभियान बलरामपुर के रेवतपुर के जंगल में पूर्ण किया गया। इसके बाद संस्था ने 20 वर्षीय मादा गौतमी को रेडियो कॉलर लगाया, जो 15 जून 2018 को मैनपाट में लगाया गया। इसके बाद 25 वर्षीय नर हाथी प्यारे को रेडियो कॉलर सूरजपुर वनमंडल के धूमाडांड़ में 28 नवंबर 2018 को लगाया गया। चौथा रेडियो कॉलर 20 वर्षीय नर हाथी महान को सूरजपुर के बगड़ा में 3 मई 2019 को लगाया गया। इसके बाद पांचवा रेडियो कॉलर 15 वर्षीय मादा कर्मा को तमोर पिंगला के खोड़ में 4 मई 2019 को लगाया गया। इसमें बहरादेव हाथी का रेडियो कॉलर गिरने के बाद उसे दोबारा फिर लगाया गया।

कॉलरिंग दो वर्ष की अवधि पूर्ण न कर सकी

पांच हाथी में रेडियो कॉलर लगाने के पीछे संस्था का मुख्य उद्देश्य हाथी के व्यवहार व अन्य गतिविधि पर लगातार नजर रखते हुए इसका अध्ययन करना था। संस्था ने रेडियो कॉलर गिरने की घटना को सामान्य बताते हुए एशिया व अफ्रीका में कई हाथियों में इसके गिरने की दलील दी है। संस्था ने कुछ हाथी के युवा होने के कारण गर्दन में इसे ढीला बांधने से गिरने की बात कहीं है ताकि लंबे अंतराल में युवा हाथी के वजन बढ़ने पर कॉलर इसके गले में न फंसे और नुकसान न पहुंचाए। जबकि कुछ में ढीला होने से लकड़ी के टुकड़े में फंसा कर हाथी ने खुद इसे निकाल दिया ऐसी भी दलील दी गई है। वजह जो भी हो लेकिन पांच हाथी में बहरादेव में यह कॉलर 404 दिन, गौतमी में 623 दिन, प्यारे में 290 दिन, महान में मात्र 13 दिन व कर्मा में सिर्फ 3 दिन तक ही रेडियो कॉलर लगा रहा। इसके बाद ये कॉलर गिर गए। बहरादेव का रेडियो कॉलर गिरने के बाद इसे 29 दिसंबर 2019 को दोबारा लगाया गया। जैसा कि मालूम है यह अभियान बेहद खर्चीला था, जिसमें एक बड़ी रकम का सीधे तौर पर नुकसान हुआ।

संस्था ने इन हाथियों में लगाया रेडियो कॉलर

रेडियो कॉलर लगाने के मापदंड क्या सही थे ?

कई अन्य वन्यप्राणी विशेषज्ञ से चर्चा के दौरान यह महत्त्वपूर्ण बात सामने आई कि रेडियो कॉलर लगाने के पीछे किसी गजदल का अध्ययन करना होता है, उसमें प्रायः गजदल के मुखिया का चयन किया जाता है जो दल में सदैव अन्य सदस्यों के साथ रहे ताकि पूरे दल का व्यवहार, विचरण अन्य स्वभाव का विस्तृत अध्ययन किया जा सके। इसके लिए प्रायः दल में मुखिया रहने वाली मादा का चुनाव किया जाता है, क्योंकि मादा हाथी हमेशा झुंड में शावक व अन्य दल सदस्यों के साथ रहती है, जबकि नर हाथी दल छोड़ कर विचरण करते रहता है। हाथियों पर शोध करने वाली संस्था की गतिविधि पर नजर डाले तो संस्था के वैज्ञानिकों ने सबसे पहले 40 वर्षीय बहरादेव हाथी को रेडियो कॉलर लगाया जो कि हमेशा शांत स्वभाव का होने के साथ अलग-थलग घूमता था , जिसका गजदल से कोई संबंध नही रहता। इसके बाद संस्था ने हथिनी गौतमी को रेडियो कॉलर लगाया जो युवा थी, परंतु दल की मुखिया नहीं थी। इसके बाद संस्था ने फिर नर हाथी प्यारे, महान को रेडियो कॉलर लगाया, ये भी प्रायः दल से अलग हो जाया करते थे और अंत में 15 वर्षीय हथिनी कर्मा को लगाया गया जो अभ्यारण क्षेत्र में ही विचरण करती थी। इस सभी हाथी को लगाये गए रेडियो कॉलर की कितनी सार्थकता रही होगी वह चयन किये गए हाथी के मापदंड से ही स्पष्ट हो जा रहा है। इसके अलावा इनमें रेडिओ कॉलर इतनी कम अवधि तक रहा कि इनका पर्याप्त अध्ययन कर पाना भी शायद संस्था के लिए संभव न हुआ होगा। इसमें यह भी बात महत्त्वपूर्ण है कि ज्यादातर कॉलर सूरजपुर वनमंडल के अंतर्गत लगाए गए जबकि हाथी विचरण के अन्य क्षेत्र जशपुर, सीतापुर पर कोई विशेष ध्यान नही दिया गया। सवाल यह भी खडा होता है कि कॉलर गिरने के बाद आखिर संस्था ने इसे सभी में दोबारा क्यों नहीं लगाया ? क्या यह अध्ययन के लिए आवश्यक नहीं था ?

मापदंड से बाहर हाथी के चयन की वजह यह तो नहीं

मिली जानकारी के अनुसार उत्तर छत्तीसगढ़ में प्रदेश सरकार से करार के तहत इस संस्था को केंद्रीय अथॉरिटी से पहले वर्ष 12 हाथियों में रेडियो कॉलर लगाने की अनुमति मिली थी। इसी अनुमति के आधार पर उक्त संस्था को विभिन्न गजदल के हाथियों में एक हाथी का चयन करते हुए रेडियो कॉलर लगाना था। ऐसे में संस्था ने अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग दल की बजाय क्षेत्र का चयन करते हुए हाथियों को यह कॉलर लगाना शुरू कर दिया। जिसका परिणाम क्या निकला यह सभी के सामने है। आज इस बात पर भी प्रश्न खड़ा होता है कि 33 माह पूर्व प्रदेश सरकार से हुए करार के बाद आखिर इस संस्था ने ऐसी कौन सी लाभदायक रिपोर्ट प्रदेश सरकार को सौंपी जिसका लाभ उठाकर सरकार ने हाथी प्रभावित क्षेत्र में इसे लागू करते हुए पीड़ित ग्रामीणों को राहत पहुंचाई हो। अभी भी ग्रामीण परंपरागत ढंग से हाथी का सामना कर रहे है। अभी भी वन विभाग का मैदानी अमला अपने सीमित संसाधन से इस समस्या से जूझ रहे है और अभी भी लगातार जनधन क्षति हो ही रही है। करार के अनुसार इस संस्था के 3 वर्ष पूर्ण होने को है ऐसे में वर्तमान प्रदेश सरकार को चाहिए कि इस संस्था से किये गए कार्य का पूर्ण विवरण लेते हुए इसकी समीक्षा करें। हैरानी की बात तो उस वक्त हुई जब वाईल्डलाईफ के सीएफ एसएस कंवर से संस्था के संबंध में पूछा गया तो उन्होनें किसी भी प्रकार की जानकारी होने से इनकार कर दिया साथ ही उन्होनें कहा कि इसकी जानकारी ऊपर ही मिल पाएगी।

अंत मे दो सवाल
1. क्या हाथी जैसे गंभीर विषय पर पिछली सरकार व संस्था के मध्य हुए करार की जांच वर्तमान सरकार कराएगी ?
2. क्या जनहित में इस संस्था की सम्पूर्ण रिपोर्ट व इसकी उपयोगिता को सार्वजनिक किया जाएगा ?

आगे भी खबरों के लिए पढ़ते रहिए मुनादी डॉट कॉम........








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