अमको-सिमको: आदिवासी प्रतिरोध की अनसुनी गाथा, 1939 का वह नरसंहार, जिसे इतिहास ने भुला दिया, पढ़िए पूरा इतिहास

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April 24, 2026



अमको-सिमको: आदिवासी प्रतिरोध की अनसुनी गाथा, 1939 का वह नरसंहार, जिसे इतिहास ने भुला दिया, पढ़िए पूरा इतिहास

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अमको सिमको / ओडिशा से सतीश शर्मा की मुनादी।। औपनिवेशिक भारत के इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम की अनेक गाथाएं दर्ज हैं, लेकिन आदिवासी इलाकों में हुए कई बड़े जनआंदोलन आज भी मुख्यधारा के इतिहास में उपेक्षित हैं। ऐसी ही एक दर्दनाक और महत्वपूर्ण घटना है अमको-सिमको नरसंहार, जो 25 अप्रैल 1939 को वर्तमान सुंदरगढ़ जिले में घटित हुआ था।


यह घटना जलियांवाला बाग हत्याकांड के लगभग 20 वर्ष बाद हुई, जिसमें ब्रिटिश पुलिस की गोलीबारी में 49 से अधिक आदिवासी मारे गए और 80 से ज्यादा लोग घायल हुए।


जनसभा से नरसंहार तक

सिमको गांव में हजारों आदिवासियों की एक शांतिपूर्ण सभा आयोजित की गई थी, जिसकी अगुवाई निर्मल मुंडा कर रहे थे। इस सभा में भूमि अधिकार, कर में राहत और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी थी।

बताया जाता है कि ब्रिटिश प्रशासन का मुख्य उद्देश्य निर्मल मुंडा को गिरफ्तार करना था। जब लोगों ने गिरफ्तारी में सहयोग नहीं किया, तो पुलिस ने सभा को तीन ओर से घेरकर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। कुछ ही मिनटों में यह सभा एक भयावह नरसंहार में बदल गई।


आंदोलन की पृष्ठभूमि: भूमि और अधिकारों की लड़ाई

1930 के दशक में आदिवासी समुदायों पर बढ़ते कर और जबरन भूमि बंदोबस्त ने भारी असंतोष पैदा कर दिया था। गांगपुर राज्य द्वारा पारंपरिक रूप से करमुक्त ‘गोड्डा’ जमीन पर भी कर लागू करने के फैसले ने आग में घी का काम किया। निर्मल मुंडा ने आदिवासियों को संगठित कर सात प्रमुख मांगों को लेकर आंदोलन शुरू किया, जिनमें प्रमुख थीं—


मुखर्जी बंदोबस्त रद्द करना

खूंटकटी अधिकार लागू करना

बेठी प्रथा समाप्त करना

जल, जंगल, जमीन पर अधिकार

अत्यधिक राजस्व से मुक्ति

रोजगार और शिक्षा की व्यवस्था

यह आंदोलन रायबोगा, बिसरा, बीरमित्रपुर और आसपास के इलाकों में तेजी से फैल गया।



गोलीबारी के बाद की बर्बरता

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, गोलीबारी के बाद मृतकों के शवों को सम्मानजनक अंतिम संस्कार देने के बजाय बीरमित्रपुर की खदानों में फेंक दिया गया। निर्मल मुंडा समेत कई आदिवासियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।आजादी के बाद 1947 में उनकी रिहाई हुई, लेकिन इस घटना को वह पहचान नहीं मिली जिसकी वह हकदार थी।



देर से मिली पहचान, पर अधूरी

स्वतंत्रता के 25वें वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने निर्मल मुंडा को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया। बाद में 1957 में वे विधायक भी चुने गए।

हाल के वर्षों में अमको-सिमको स्थल पर एक 36 फीट ऊंचा स्मारक स्तंभ बनाया गया है और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। फिर भी आदिवासी संगठनों की मांग है कि इस आंदोलन को आधिकारिक रूप से स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा माना जाए और सभी शहीदों को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिया जाए।



इतिहास में स्थान की मांग

अमको-सिमको की यह घटना केवल एक नरसंहार नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अधिकार, स्वाभिमान और अस्तित्व की लड़ाई का प्रतीक है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि सीमित दस्तावेजीकरण और ऐतिहासिक उपेक्षा के कारण ऐसे आंदोलनों को उचित पहचान नहीं मिल सकी। अब समय है कि शोध, शिक्षा और सरकारी पहल के जरिए इन भूले-बिसरे अध्यायों को राष्ट्रीय चेतना में स्थान दिया जाए। अमको-सिमको के शहीदों को इतिहास में सम्मानजनक स्थान दिलाना ही उनके बलिदान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


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