सुलग रहा है बस्तर, इसमें घी नहीं पानी डालिए, कहीं नक्सलवाद से बड़ा नासूर न बन जाए यह समस्या, कहीं झगड़ा कहीं हमला तो कहीं .…........ पढ़िए पूरा विश्लेषण

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January 03, 2023



सुलग रहा है बस्तर, इसमें घी नहीं पानी डालिए, कहीं नक्सलवाद से बड़ा नासूर न बन जाए यह समस्या, कहीं झगड़ा कहीं हमला तो कहीं .…........ पढ़िए पूरा विश्लेषण

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बस्तर मुनादी।। बस्तर के नारायणपुर जिले में सोमवार को कथित धर्मांतरण को लेकर बड़ा बवाल मच गया है। दो पक्षों के बीच में विवाद इतना बढ़ गया कि मौके पर गए एसपी को घायल होकर वापस लौटना पड़ा। स्थिति  पूरी तरह तनावपूर्ण हो गई है। सोमवार को धर्मांतरण के विरोध में सर्व आदिवासी समाज ने नगर बंद का आह्वान किया था उसी दौरन यह घटना घटी। हालांकि इसकी पृष्ठभूमि बहुत दिन से तैयार की जा रही थी। 

दरअसल छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय बड़ी संख्या में रहता है । बस्तर और सरगुजा संभाग में सबसे ज्यादा आदिवासी समुदाय के लोग हैं। कहा जा रहे कि इन्हीं को साधने के लिए इस तरह का खेल सरगुजा से शुरू किया गया। हालांकि वहां इनका यह गेम प्लान फेल हो गया लेकिन बस्तर इस गेम प्लान का शिकार हो गया। वहां आदिवासी अपने ही समुदाय का शत्रु बन बैठा है और पिछले एक माह से लगातार वहां डिलिस्टिंग के नाम पर आंदोलन चलाया जा रहा है इसी की परिणति सोमवार की घटना है। बताया जाता है कि दो गुटों में लाठी डंडे और पथराव के अलावा एक धार्मिक स्थल पर हमला भी हुआ है।

डीलिस्टिंग आंदोलन की शुरुआत सरगुजा संभाग के जशपुर से शुरू की गई। आदिवासियों को कहा गया कि ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासी उनका हक मार रहे हैं। उन्हें आदिवासी होने के साथ साथ अल्पसंख्यक होने का भी लाभ मिल रहा है। इसके बाद आदिवासियों के वर्ग को आंदोलन के लिए तैयार किया गया। फिर जगह जगह डीलिस्टिंग आंदोलन होने लगे जिसमें प्रमुख मांग यह थी कि जो आदिवासी ईसाई या अन्य धर्म अपना लिए हैं उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। भाजपा और संघ के प्रभाव वाले आदिवासियों ने यह मांग पूरे सरगुजा संभाग में उठाई लेकिन उनकी रैली और सभा में आदिवासियों की भीड़ नहीं जुट सकी या जुटी भी तो उसमें सिर्फ भाजपा कार्यकर्ता ही ज्यादा दिखे, लिहाजा यहां यह आंदोलन लगभग खत्म हो गया।

इसका कारण बताते हुए सर्व आदिवासी समाज के नेता बीआर रावते कहते हैं कि सरगुजा संभाग के आदिवासी पढ़े लिखे हैं, वे जानते हैं कि आदिवासी सिर्फ आदिवासी होता है हिंदू या ईसाई नहीं । उनकी यह मांग संवैधानिक नहीं है क्योंकि संविधान के अनुसार इस मांग को पूरा नहीं किया जा सकता है। इसलिए सरगुजा संभाग में यह आंदोलन सफल नहीं हो पाया लेकिन बस्तर में इसी आंदोलन के आधार आदिवासियों को बांट दिया गया है। भाई भाई का दुश्मन बन गया है। उनका कहना है कि जो आरएसएस मेघालय में ईसाइयों के साथ क्रिसमस मनाती है वही आरएसएस छत्तीसगढ़ में ईसाई और हिंदू आदिवासियों के बीच वैमनस्य फैला रही है।

उनका यह भी कहना है कि सरकार ने यदि ध्यान नहीं दिया तो यह समस्या नक्सलवाद से भी बड़ा बन जायेगा। इसे रोकना बड़ा मुश्किल हो जायेगा। आदिवासियों के बीच जब खाई गहरी हो जायेगी तो नारायणपुर जैसी स्थिति रोज होगी। आदिवासी नेता अरविंद नेताम के अनुसार मिल बैठकर ही ऐसी समस्या का समाधान किया जा सकता है। इस तरह की घटना को रोकना चाहिए। एक अन्य आदिवासी नेता का कहना था कि सरकार ने यदि अभी इस समस्या का समाधान नहीं निकाला तो आगे और मुश्किल होगी, उनका यह भी कहना था कि यह चुनाव को ध्यान में रखकर लगाई गई आग है।

पिछले एक माह से लगातार बस्तर में आदिवासी समुदायों के बीच का टकराव रोज की घटना बन रही है। इस संबंध में द हिंदू ने बहुत अच्छे तरीके से इन घटनाओं के बारे में लिखा है लेकिन सरकार इस मुद्दे पर लगभग मूकदर्शक बनी हुई है। एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि संभाग के कई गांवों से आदिवासी समुदाय के लोगों को गांव से बाहर कर दिया गया है जो दूसरे गांव में रह रहे हैं, इसे रोकने सरकारी स्तर पर कोई कदम ही नहीं उठाए गए। ऐसे में कभी भी स्थिति विस्फोटक हो सकती है।
कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सत्ता से बाहर है और इस साल के अंतर चुनाव है इसीलिए आदिवासी क्षेत्रों में यह खेल खेला जा रहा है।  भाजपा के पास धर्म के अलावा और कोई मुद्दा ही नहीं है। समाज में जबतक धर्म के नाम पर बंटवारा होता रहेगा इनकी दुकान चलती रहेगी लेकिन राज्य सरकार की भी जिम्मेदारी है कि कोई ठोस कदम उठाई जाय। हालांकि स्थानीय आदिवासी नेता यह भी मानते हैं कि जंगलों में धर्मांतरण के भी कई मामले सामने आए हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन इस मामले में अफवाह जिस तरह से फैलाई जाती है वह भयावह है। उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं।



बीआर रावते कहते हैं कि जिन गांवों में नक्सलियों का वर्चस्व है, जहां कोई जा नहीं सकता उन गांवों में धर्मांतरण का हल्ला ज्यादा होता है। जब वहां कोई बाहरी जा नहीं सकता वहां कौन धर्मांतरण करा रहा है और कौन उसे देखकर आ रहा है और लोगों को बता रहा है ? यह मामला आधा सच आधा झूठ वाला ठहरता है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले शहरों में चर्च दिखाता था लेकिन जब गांवों में चर्च बनने शुरू हुए तो ऐसी घटनाएं शुरू हो गई। धर्मांतरण के अफवाह को बल मिला।

मामला चाहे चुनावी राजनीति की हो या धर्म का लेकिन इससे आदिवासियों को कोई फायदा होता नहीं दिखता है उलटा उनके बीच विद्वेष ही फैल रहा है। आदिवासियों को तोड़ा जा रहा है, उनमें फूट दल दी गई है। इस बात को आदिवासी समुदाय को समझना है और उनके नेताओं को अपने समाज के लोगों को समझाने की भी जरूरत है। समझ के नेताओं को सामने आकर इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए। साथ ही शासन और प्रशासन को यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी पर अन्याय न हो। 


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