जशपुर मुनादी।। क्या कुनकुरी में बीजेपी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है? क्या भाजपा के गढ़ में अब विरोध की आवाज़ें घर के भीतर से ही उठने लगी हैं? एक व्हाट्सएप ग्रुप की चर्चाएं अब पूरे शहर की चर्चा बन चुकी हैं। आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि जिन लोगों को बीजेपी का सबसे मजबूत समर्थक माना जाता था, वही अब सवाल उठाते दिखाई दे रहे हैं? पढिये ये खास रिपोर्ट-
कुनकुरी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का विधानसभा क्षेत्र और अब एक व्हाट्सएप ग्रुप की वजह से पूरे इलाके में राजनीतिक हलचल की चर्चा तेज हो गई है।जिस ग्रुप का नाम है कुनकुरी जनमंच ।यह कोई साधारण व्हाट्सएप ग्रुप नहीं माना जाता। इसमें नगर के छोटे-बड़े नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, व्यापारी,बुद्धिजीवी और लगभग हर वर्ग के लोग जुड़े हुए हैं। स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, इस ग्रुप के अधिकांश सदस्य बीजेपी समर्थक या बीजेपी की विचारधारा से जुड़े माने जाते हैं।लेकिन पिछले कुछ दिनों से तस्वीर बदलती हुई दिखाई दे रही है।ग्रुप में लगातार ऐसे पोस्ट, टिप्पणियां और स्टेटस सामने आ रहे हैं, जिनमें बीजेपी की नीतियों, राष्ट्रीय नेतृत्व और राष्ट्रीय मुद्दों पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि
क्या यह सिर्फ कुछ लोगों की नाराजगी है?या फिर
क्या भाजपा के गढ़ में बीजेपी के भीतर असंतोष की आवाज़ें धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगी हैं?"जनमंच ग्रुप" की चैट्स और पोस्ट अब लोगों के मोबाइल से निकलकर शहर की चाय दुकानों, चौक-चौराहों और राजनीतिक गलियारों तक चर्चा का विषय बन चुकी हैं।
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि इससे बीजेपी को कितना राजनीतिक नुकसान होगा या पार्टी के भीतर वास्तव में कितनी बेचैनी है। लेकिन इतना जरूर है कि जिस मंच पर कभी पार्टी समर्थकों की आवाज़ ज्यादा सुनाई देती थी, वहीं अब अब वही भाजपा समर्थक भाजपा के काम काज और रवैयों पर खुलेआम तंज कसा रहे हैं।
और यही वजह है कि लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह केवल सोशल मीडिया की बहस है?
या आने वाले दिनों की राजनीति का संकेत?
एक अहम सवाल यह भी है कि क्या बीजेपी इस नाराजगी को समय रहते दूर कर पाएगी?या फिर
भाजपा के अपने गढ़ से उठ रही ये आवाज़ें आगे चलकर और तेज होंगी?
इन सवालों के जवाब आने वाला समय देगा।
फिलहाल कुनकुरी का "जनमंच" व्हाट्सएप ग्रुप सिर्फ एक ग्रुप नहीं, बल्कि पूरे इलाके की सबसे चर्चित राजनीतिक बहस का मंच बन चुका है।
कुनकुरी के पाठकों से सवाल:क्या यह लोकतांत्रिक असहमति है, कुछ लोगों की व्यक्तिगत नाराजगी, या फिर बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत?