जशपुर मुनादी।। प्रदेश के सबसे अंतिम छोर पर बसे जशपुर जिले का एक इलाका साँप और सोने की नगरी के रूप में जाना जाता है । नागराज ,नाग -नागिन या नागलोक यह सब कहानियों में पढ़ने वाली बातें लगती हैं और आज के वक़्त में यह भी सुनने में अजीब लगता है कि कोई इलाका सोने की नगरी भी हो सकती है ।
जशपुर जिले का फरसाबहार ईलाका ऐसी जगह हैं जहाँ साँप ओर सोना दोनो की उपलब्धता है । फरसाबहार क्षेत्र को आज भी लागलोक कहा जाता है क्योंकि यहाँ कई प्रजाति के साँप पाए जाते है और इस क्षेत्र में सांपों की संख्या ज्यादा है ।कुछ वर्षों पहले यहां सर्पदंश से कई मौतें होती थी ।मानसून के महीने के पहले सप्ताह से ही भुजंगो का कहर शुरू हो जाता था लेकिन बाद में कुछ समाज सेवियों ने सर्प दंश से मौत के कारणों पर अनुसंधान करने के बाद लोगों को जागरूक करना शुरू किया फलस्वरूप मौत के आंकड़ों में भारी कमी आयी ।
फरसाबहार ब्लॉक के तपकरा में सांपों पर अनुसंधान के लिए विशेष तौर पर सर्प ज्ञान केंद्र भी खोला गया और तपकरा में ही स्नेक पार्क के प्रस्ताव भी सरकार को भेजे जा चुके हैं लेकिन अभी तक इसकी स्वीकृति नहीं मिल पाई है ।
एक पौराणिक कथा को लेकर भी इस क्षेत्र के लिए एक बात कही जाती है कि जब मारीच सोने का हिरण बनकर माता सीता को लुभाने गया था तब राम ने उसका पीछा किया और उसपर तीर चलाए। राम के तीर के बेग से मारीच का सर तो कही और चला गया लेकिन उसका धड़ यही आकार गिरा जिससे यहां के मिट्टी के कणों में सोना पाया जाता है।
फरसाबहार क्षेत्र में केवल साँप ही नहीं यहाँ सोने की भी भारी मात्रा में उपलब्धता है ।यहाँ कई ऐसी नदी पहाड़ है जिनके नाम के आगे सोना जुड़ा हुआ है ।जैसे सोनाजोरी नदी ,सोनाटोंगरी (पहाड़)ऐसे ऐसे कई जगह है जिनके नाम के आगे सोना जुड़ा हुआ ।नाम को लेकर कई सारे किस्से कहानियां सुनने को मिलती हैं लेकिन यह तो हकीकत है कि यहाँ के रेत में आज भी सोना निकलता है । यहाँ के ईब ,उतियाल और सोनाजोरी नदी के किनारों पर आज भी कई लोग रेत से सोना निकालते देखे जाते हैं ।हांलाकि वर्तमान में रेत से सोना निकालने वालो की संख्या बहुत कम हो गयी है क्योंकि इस काम से जुड़े ज्यादातर लोग या तो दूसरे शहर में काम कर रहे है या फिर जो बाहर नहीं गए हैं वो यहीं रहकर दूसरा कारोबार कर रहे हैं ।10 -20 वर्ष पूर्व एक वर्ग रेत से सोना निकालकर ही अपना जीविकोपार्जन करता था ।इनसे सोना भी स्थानीय व्यापारी ही खरीदा करते थे । ग्रामीणों द्वारा रेत से निकाले गए सोने को कच्चा सोना कहा जाता है ।बाद में उसी सोना को व्यापारी ठोश बनाते थे और बाहर के शहरों में सप्लाई करते थे ।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि जहाँ साँपों की अधिकता होती है वहाँ की मिट्टी में सोना होता है ।खैर , यह इलाका भले ही सोने की नगरी हो लेकिन विडंबना है कि सोने के संग्राहक पेट की भूख मिटाने के लिए आज भी परदेश में पलायन करने को मजबूर हैं ।आज भी यहां लोग मानव व्यापार जैसे घातक धंधे के चपेट में आते देखे जाते है ।