रायगढ़ मुनादी।। संभवतः यह पहली बार होगा कि किसी नगर निगम के सामान्य सभा में किसी अदालती फैसले का ही पोस्टमॉर्टेम कर दिया गया। सब की दलील धरी की धरी रह गई। अधिकारी जिन्हें अदालती फैसले को समझना था उन्हें सामान्य सभा में उपस्थित वकीलों ने बताया कि फैसला आखिर क्या है ? इस प्रस्ताव को ध्वस्त कराने में कई लोगों की भूमिका रही।
मामला नगर निगम के सामान्य सभा की बैठक में पारित संकल्प का है जिसे शुक्रवार को सामान्य सभा ने फिर से रि-स्टेट कर दिया। दरअसल 2011 में नगर निगम ने एक संकल्प पारित कर पूरे शहर को 5 भागों में विभाजित कर संपत्ति कर आरोपित किया था। इसके चपेट में जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड आ गई। दरअसल नगर निगम की सीमा में जिंदल उद्योग से सटे गांव गोरखा, पतरापाली, खैरपुर आये तो संपत्ति कर निर्धारण के लिए उस क्षेत्र को पांचवां जोन घोषित कर दिया और उस क्षेत्र के संपत्ति कर की दर भी बढ़ा दी और करोड़ो का बिल थमा दिया।
जिंदल उद्योग ने इस करारोपण का विरोध करते हुए स्व कर निर्धारण करते हुए अपना संपत्ति कर 3 करोड़ 90 लाख का बताया और शहर में जिंदल उद्योग के लिए विशेष जोन बनाये जाने का भी विरोध किया। इसके बाद नगर निगम ने एक समिति बनाकर जिंदल समूह का पक्ष भी सुना लेकिन उनका कर की दर यथावत रखा। इसके विरोध में जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड हाई कोर्ट चली गई और कहानी यहीं से शुरू होती है। बाद में हाई कोर्ट ने नगर निगम के करोड़ो के वसूली के नोटिस को अमान्य करते हुए नगरनिगम को निर्देशित किया कि वे अपने फैसले पर नियमतः पुनर्विचार करे।नगर निगम ने इस मसले को सामान्य सभा में बहस के लिए भेज दिया।
शुक्रवार को नगर निगम के सामान्य सभा की बैठक में हाइकोर्ट के फैसले और उसमें नगर निगम के वकीलों की भूमिका पर ही बहस शुरू हो गयी। बहस के दौरान पार्षदों को हाइकोर्ट के आदेश की कॉपी भी दी गई वह भी बाकायदा हिंदी अनुवाद के साथ। दरअसल फैसले में जब यह बात पढ़ी गई कि नगरनिगम के वकीलों ने ही करारोपण के फैसले पर पुनर्विचार को स्वीकार किया तब पार्षदों ने पूछा कि वकीलों ने किस अधिकारी के कहने पर यह बात कोर्ट में कही। हालांकि सभापति ने यह कहकर सबको शांत किया कि कई बार मौके पर वकील भी स्वविवेक से निर्णय करते हैं।
इस संदर्भ में भाजपा पार्षद सुभाष पाण्डेय ने कहा कि कोर्ट ने नोटिस को अमान्य किया है न कि करारोपण को। इसके बाद सदन में उन नियमों को भी पढ़कर सुनाया गया जिसके अंतर्गत यह करारोपण किया गया था। अंततः इस बात पर सभी पार्षद सहमत थे कि पुराने संपत्ति कर को ही बहाल किया जाए। पेश प्रस्ताव, जिसमें जिंदल उद्योग समूह को जोन 3, 4 में सम्मिलित करने की बात थी इस प्रस्ताव का समर्थन किसी ने नहीं किया। न कांग्रेस पार्षदों ने न ही भाजपा पार्षदों ने।
इससे पहले की सामान्य सभा के बैठक जो जून 2021 में हुई थी, के बाद निगम के MIC में आक्रोश के स्वर फूटे थे और MIC का पुनर्गठन करना पड़ा था। तब यह कहा गया था कि इसके पीछे यही प्रस्ताव था जिसके विरोध में कांग्रेस पार्षद थे जिसके कारण पार्षद दल में विद्रोह हो गया था। हालांकि शुक्रवार को इस प्रस्ताव का पक्ष किसी ने नहीं लिया यहां तक कि इसे पेश करने वाले संजय देवांगन भी इसके पक्ष में नहीं बोल सके।
लेकिन जैसे ही पिछली बार इस प्रस्ताव की भनक लगी कई लोग इस प्रस्ताव का विरोध करने लगे थे। भाजपा नेता आशीष ताम्रकार इसके लिए लगे और फैसले के अध्ययन से लेकर आपमे पार्षदों को समझाने तक काफी मेहनत की। उनके गोलबंदी का ही असर था कि भाजपा पार्षद फैसले और वकीलों पर भी टिप्पणी करने से नहीं चूके। इधर कांग्रेस के भी कई पार्षद नहीं चाहते थे कि यह प्रस्ताव पास हो।
अब इस फैसले के खिलाफ भी जिंदल उद्योग का कोर्ट जाना तय माना जा रहा है, बावजूद इसके पुराने संकल्प के पुनर्बहाली को सभी पक्ष अपनी-अपनी जीत बताने में लग गए हैं हालांकि अधिकारी यह चाहते थे कि यह प्रस्ताव पास हो और जिंदल उद्योग से पैसा मिलना शुरू हो जाय जिससे निगम के विकास कार्य न रुकें।

