सच की मुनादी।। मैं नटवर स्कूल हूँ, मैं कभी रायगढ़ की शान किरोड़ीमल नटवर बहुउद्देशीय विद्यालय हुआ करता था। हमारा निर्माण 1906 में हुआ था। तब से आजतक इस विद्यालय से पढ़ाई कर कई छात्रों ने देश प्रदेश में नाम कमाया। लेकिन आज हमारा अस्तित्व मिटा दिया गया है। मेरे नाम को लोपित कर दिया गया है। जब कोई भवन खासकर पब्लिक प्रॉपर्टी 100 साल से भी ज्यादा समय की हो जाती है तो वह भवन उस शहर या प्रदेश की धरोहर मानी जाती है। लेकिन मेरी पीड़ा कौन समझेगा ? न तो यहां के लोग न आपकी चुनी हुई सरकार।
पिछले 10 सालों से छत्तीसगढ़ में ऐसे धरोहरों को सरकारें नेस्तनाबूद करने पर उतारू है। हालांकि नटवर स्कूल का यह भवन खड़ा है लेकिन 2017 में रायपुर के एक सैकड़ो साल पुराने पेड़ को कटवा दिया गया था। उस समय वहां के बुद्धिजीवियों ने विरोध स्वरूप कैंडल मार्च किया था। रायगढ़ के ही बहुत पुराने एडवर्ड स्कूल के भवन को जमींदोज कर दिया गया, एडवर्ड होस्टल के स्वरूप को बदल दिया गया था लेकिन तब हमने सरकारों को कुछ नहीं कहा था। हमारे इसी मृत राजनीतिक चेतना ने सरकार को यह साहस दिया कि यहां के इस धरोहर के नाम को भी विलोपित कर सके। हालांकि नटवर स्कूल के नाम को विलोपित किये जाने का आज कुछ लोगों द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जा रहा है।
जब हम अपने ऐतिहासिक धरोहरों के गिराए जाने, हमारी भावनाओं के कुचले जाने पर विरोध या मत प्रदर्शन करने के अधिकार को हम जाहिर नहीं करते तब सरकारों को आपकी राजनीतिक चेतना को आहत करने का बल मिल जाता है, फिर इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं। इसके बाद कितना भी विरोध कर लें उसका कोई परिणाम सामने नहीं आता।
जब निगम के सामान्य सभा में अपने शहर और जिले के महान लोगों के बजाए एक उद्योगपति के नाम पर सड़क का नामकरण मेजें थपथपाकर कर देते हैं, किसी उद्योगपति द्वारा गोलियां चलाने, हत्या और हत्या के प्रयास करने पर भी आप चुप रह जाते हैं, सरकारों के दमन चक्र को चुपचाप सह लेते हैं तो कोई भी, चाहे सरकार हो या कोई मजबूत उद्योगपति, आपकी भावनाओं के सम्मान की उपेक्षा कर देता है क्योंकि वह आपकी एकजुटता, राजनीतिक साहस के क्षमता से भलीभांति परिचित होता है। वह न सिर्फ आपकी भावनाओं की उपेक्षा करता है बल्कि उसका उपहास भी उड़ाता है।
बहरहाल अब नटवर स्कूल के नाम पर भी लोगों का वह स्प्रिट नहीं दिखता जो दिखना चाहिए ऐसे में कोई प्रशासन या सरकार आपकी क्यों सुनेगा ? इसके लिए जरूरी है कि आप एकजुट हों और लोगों को साथ लेकर लोकतांत्रिक दवाब सरकार पर बनाएं। सरकार को यह एहसास हो कि धरोहरों से, शहर से, यहां के हर चीज से, जो आपके जीवन को कभी भी किसी भी स्वरूप में प्रभावित किया हो, आपका वास्तिविक जुड़ाव कितना है।

