रायपुर मुनादी।। बस्तर के सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी सहित चार लोगों को राजद्रोह के आरोप से अदालत ने मुक्त कर दिया है। NIA की विशेष अदालत ने यह फैसला देते समय कहा कि सोनी सोरी और अन्य आरोपियों पर राजद्रोह का आधार सिर्फ शक है। इनके खिलाफ कोई सबूत पेश करने में अभियजन असफल रहा।
प्रदेश के दंतेवाड़ा ज़िले की NIA की विशेष अदालत ने राजद्रोह के आरोपी सोनी सोरी सहित उनके भतीजे लिंगाराम कोडोपी, बीके लाला और डीवीसीएस वर्मा को वर्ष 2011 के राजद्रोह के मामले से बरी कर दिया। इनमें से एक एस्सार कंपनी के अधिकारी भी थे। इस मामले में सोनी सोरी की जमानत सुप्रीम कोर्टसे मिल चुकी थी लेकिन उनका आरोप है कि पुलिस
ने उनपर बेइंतहां जुल्म किए।
सोरी और उनके साथियों पर आरोप था कि वे माओवादियों को पैसा पहुंचाते थे। इसी आरोप में छत्तीसगढ़ की तत्कालीन सरकार ने इन्हेंरंगे हाथों गिरफ्तार करने का दावा किया था। इसी मामले में सोरी को 2011 में दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था और दंतेवाड़ा लाकर पुलिस ने पूछताछ की थी। सोनी सोरी बस्तर में सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर आदिवासियों की मदद करती थी। उनका आरोप है कि इसीलिए सरकार ने उनको टारगेट किया। दंतेवाड़ा जिले की आदिवासी कार्यकर्ता सोरी बस्तर में सुरक्षा बलों और माओवादियों द्वारा आम आदिवासियों की हत्या का मुद्दा भी उठाती रही हैं।
सोनी सोरी ने 2014 में तत्कालीन नवोदित राजनीतिक पार्टी आम आदमी पार्टी जॉइन किया था उसके टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़ी थी लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पाई थी। बाद में उन्होंने पार्टी छोड़कर फिर से सामाजिक काम में लग गई। लेकिन दूसरी ओर उनपर मुकदमा भी चल रहा था।
NIA के विशेष अदालत के जज विनोद कुमार देवांगन ने चारों आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष सिवाय शक के आरोपियों के खिलाफ आरोपों को साबित नहीं कर पाई। इस फैसले से सोनी सोरी तो खुश हैं लेकिन उनका कहना है कि क्या अब सरकार या पुलिस उनका 11 साल वापस कर सकते हैं ?

