जशपुर मुनादी।। जिले के पत्थल गाँव मे शिक्षा विभाग और पत्रकारों के बीच जमकर ठन गयी है। राजीव गांधी शिक्षा मिशन के पत्थल गाँव बी आर सी द्वारा जारी किए गए एक प्रेस विज्ञप्ति को लेकर प्रेस क्लब पत्थल गाँव के पत्रकार और बीआर सी आमने सामने हो गए हैं।
दरअसल शनिवार को अखबारो में एक खबर आई थी जिसमे स्कूलों में आये अनुदान राशि के बनरबाँट किये जाने का मामला प्रकाशित किया गया था ।यह बताया गया था कि स्कूल के प्रधानपाठकों के उपर बीआरसी कर द्वारा एक फर्म विशेष से सामग्री क्रय करने का दबाव बनाया जा रहा है इतना ही नहीं ,इस कार्य के लिए बी.आर.सी के कर्मचारी द्वारा बकायदा फर्म का नाम बिल व्हाउचर एवं एकाउंट नंबर भी प्रेषित किये जाने का भी मामला उजागर किया गया था।
किस तरह का अनुदान स्कूलों में आया है और इसमें क्या गोलमाल है हम आपको वो भी बताएंगे लेकिन इससे पहले यह बता दें कि यह मामला जैसे ही अखबारों में उजागर हुआ बीआरसी सन्तोष साहू के द्वारा एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अखबारो में प्रकाशित खबरो को झूठलाने की कोशिश की जाने लगी । बीआरसी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि अखबारो में उनके पर लगाये गए आरोप झूठ और बेबुनियाद है।उनके द्वारा किसी भी प्रधान पाठक के उपर किसी तरहः का कोई दबाव नही बनाया गया है।
बीआरसी की प्रेस विज्ञप्ति जैसे ही लोकल मीडिया डेस्क तक पहुँची पत्रकार आक्रोशित हो गए ।उनके द्वारा कहा गया है कि बीआरसी अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए अखवारों में प्रकाशित खबरों को बगैर तथ्य के निराधार बता रहे हैं जबकि प्रेस के पास इस मामले के सबूत भी है । पत्रकारों का कहना है कि वे इस मामले का तथ्य कलेक्टर के सामने पेश करेंगे और बीआरसी की शिकायत की जाएगी ।
आपको बता दें कि प्रतिवर्ष स्कूलों में सामग्री क्रयके लिए शासन द्वारा स्कूलों को अनुदान राशि दी जाती है। प्राथमिक,मिडिल और हाईस्कूलों में अमुदान राशि दी जाती है। हाई स्कूल में सबसे ज्यादा अनुदान राशि आता है जबकि प्राथमिक और मिडिल स्कूलों की राशि मे भी काफी अंतर होता है।5 हजार,10 हजार,और 25 हजार की अनुदान राशि स्कूलों के प्रधानपाठको के खाते में डाल दी जाती है।नियम यह है कि आवश्यकता के मुताबिक प्रधान पाठक स्कूलों के लिए सामग्रियों की खरीददारी करेंगे लेकिन बीते 2 वर्षो में इन राशियों को लेकर मुनाफाखोरी की कई खबरे सामने आ चुकी है। खाश फर्म के व्यापारी सामग्री सप्लाई का अघोषित ठेका ले लेते हैं और पैसे प्रधानपाठक के हिसाब से नही बल्कि सप्लायर के हिसाब से खर्च किया जाता है ।बिगत वर्ष खेलगढिया योजना में कई ऐसे खेल सभी के सामने उजागर हो चुके है ।

