जशपुर मुनादी।। इन दिनों जशपुर जिले में कलेक्टर रितेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में विशेष पिछड़ी जनजातियों के लिए विशेष शिविरों का आयोजन किया जा रहा है। जहां इन विशेष पिछड़ी जनजातियों को विकास और योजनाओं से जोड़ने की कवायद चल रही है।
अभी पिछले दिनों ग्राम देवडाण्ड में इसी प्रकार के शिविर का आयोजन किया गया था, वहां भी पहाड़ी कोरवा पहुंचे, तो उन्होंने अपने अधिकारों की बात की। दरअसल यहां पहाड़ी कोरवाओं ने जो मांग किया वो था पर्यावास अधिकार (Hbitet rights) का। दरअसल उपस्थित कुछ शिविर कर्मचारियों को समझ भी नही आया कि क्या होता है,पर मांग तो थी वो भी अपने अधिकारों के लिए।
जिसमे पहाड़ी कोरवाओं ने लिखा बग़ीचा खुड़िया क्षेत्र में विशेष पिछड़ी जनजाति पहाड़ी कोरवा जंगलों में निवास करते हैं, उनका जीवन यापन जंगलों पर ही निर्भर है। और वो पीढ़ियों से इस क्षेत्र में निवास करते हैं, तथा इस क्षेत्र और जशपुर जिले को ही पहाड़ी कोरवाओं के उद्भव या जन्म स्थान माना जाता है। यह क्षेत्र पर्यावास अधिकार के लिए उपयुक्त भी है।
छत्तीसगढ़ में पार्यावास अधिकार के तहत सामुदायिक वन अधिकार की धारा 3(1)(e) के तहत कानून बनने के बाद भी इस क्षेत्र में लागू नहीं किया गया है। ना किसी समुदाय को ही इसका लाभ मिला है। वहीं उन्होंने मध्यप्रदेश का हवाला देते हुए लिखा कि मंडला और डिंडोरी जिले में यह अधिकार मिल चुका है, वहीं छिंदवाड़ा जिले में मिलने वाला है। अतः हमारे इस अधिकार को लागू करें।

क्या है पार्यावास अधिकार के तहत वन अधिकार-
(क) वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के किसी सदस्य या किन्हीं सदस्यों द्वारा निवास के लिए या जीविका के लिए स्वयं खेती करने के लिए व्यक्तिगत या सामूहिक अधिभोग के अधीन वन भूमि को धारित करने और उसमें रहने का अधिकार;
(ख) निस्तार के रूप में सामुदायिक अधिकार, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हों, जिनके अंतर्गत तत्कालीन राजाओं के राज्यों, जमींदारी या ऐसे अन्य मध्यवर्ती शासनों में प्रयुक्त अधिकार भी सम्मिलित
(ग) गौण वन उत्पादों के, जिनका गांव की सीमा के भीतर या बाहर पारंपरिक रूप से संग्रह किया जाता रहा है स्वामित्व संग्रह करने के लिए पहुँच, उनका उपयोग और व्ययन का अधिकार रहा है;
(घ) यायावरी या चरागाही समुदायों की मत्स्य और जलाशयों के अन्य उत्पाद, चरागाह (स्थापितऔर घुमक्कड़ दोनों) के उपयोग या उन पर हकदारी और पारम्परिक मौसमी संसाधनों तक पहुंच के
अन्य सामुदायिक अधिकार;
(ङ) वे अधिकार, जिनके अंतर्गत आदिम जनजाति समूहों और कृषि पूर्व समुदायों के लिए गृह और आवास की सामुदायिक भू-धृतियां भी है,

