05-April-2022


माननीयों ! आपकी पॉलिटिक्स क्या है ? कानून पर भरोसा नहीं या कानून जेब में रखना है ? क्या सब कुछ आपने तय कर लिया है ? 



रायगढ़ मुनादी।। रायगढ़ शहर में पिछले एक सप्ताह में दो बड़ी घटनाएं हो गयी और दोनों में कानून ने लगभग वही किया है जो उससे अपेक्षित है लेकिन दोनों मामलों में अलग-अलग राजनीतिक समूहों का लगभग एक सा नजरिया है। दोनों मामले में दवाब डालने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे उन्हें  या तो उन्हें कानून पर भरोसा नहीं है या  वे कानून को काम करने देना नहीं चाहते। लगता है जैसे उन्होंने सब कुछ पहले से तय कर लिया है और उनके सोचे गए खुद के निर्णय में वे हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं । एक मामले में जहां एक व्यक्ति को निर्दोष मान लिया गया है वहीं दूसरे मामले में एक मात्र को ही दोषी माना जा रहा है। यह भी लगता है जैसे उन मामले में हालात और तत्कालीन परिस्थितियों के बारे में न कोई जानना चाहते हैं न ही उसे परिलक्षित होने देना चाहते हैं। हालांकि इनमें से एक घटना संभावित थी तो दूसरी घटना अचानक हुई जिसकी कल्पना भी नहीं की जा रही थी।

शहर में पहली घटना 31 मार्च को हुई जिसने सबको स्तब्ध कर दिया। शहर के तेज तर्रार पार्षद संजना शर्मा के आत्महत्या की खबर ने सबको हिला दिया। शाम होते तक पुलिस ने बताया कि संजना शर्मा के कमरे से कुछ दस्तावेज बरामद किए गए हैं जिनमें से एक आवेदन भी है जो थाना प्रभारी चक्रधर नगर के नाम से संबोधित था। उस आवेदन में कहा गया था कि यदि मेरे द्वारा कोई ऐसी घटना कारित की जाए जिससे मेरी मृत्यु या शारीरिक क्षति हो जाये तो इसके लिए अमित पाण्डेय जिम्मेदार होगा। इसके बाद पुलिस ने अमित पाण्डेय को गिरफ्तार भी कर लिया।  अब यह मामला पूरी तरह कानून और पुलिस के पाले में चली गयी।

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दूसरी घटना 1 अप्रैल को हुई जिसका होना पहले से निश्चित माना जा रहा था। 1 अप्रैल को एक महिला भाजपा कार्यकर्ता में भाजपा के रायगढ़ जिलाध्यक्ष पर छेड़छाड़ करने की लिखित शिकायत थाने में जाकर कर दी। दरअसल भाजपा के अंदर दो महिला कार्यकर्ताओं ने भाजपा मंडल अध्यक्ष और भाजपा के जिलाध्यक्ष पर 25 मार्च को रायगढ़ आई भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष सरला कोसरिया के सामने पहले आरोप लगाई इज़के बाद उनकी सलाह पर उन्होंने भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष विष्णुदेव साय के समक्ष इस मामले की लिखित शिकायत कर दी।

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मामला लीक होने पर भाजपा के रायगढ़ जिलाध्यक्ष उमेश अग्रवाल ने munaadi.com को एक इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने पीड़िताओं को ललकारते हुए कहा कि यदि उनकी बातों में सच्चाई है तो वे प्रदेश अध्यक्ष के बजाय थाने जाएं और अपनी शिकायत वहां करें। इस घटना के बाद दो पीड़िताओं में से एक ने कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज करवाई । दूसरे पीड़िता को भाजपा से निष्कासित कर दिया गया लेकिन उसने मंडल अध्यक्ष के साथ हुए चैट को लीक कर दिया और भाजपा पर जमकर भड़ास निकाली। यदि एक नजरिया से देखें तो पीड़िता ने वही किया था जिसकी चुनौती भाजपा जिलाध्यक्ष उमेश अग्रवाल ने दी थी। इस मामले में पांच अप्रैल को पुलिस ने FIR दर्ज कर ली। यह मामला भी कानून के पाले में चली गयी। हालांकि इस मामले में आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई।

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लेकिन इस मामले में शुरू से पुलिस पर दवाब बनाने की कोशिश की जाने लगी। लिखित शिकायत के बाद भाजपा के पदाधिकारियों ने FIR किये जाने पर पहले आंदोलन की चेतवानी दी फिर प्रेस कांफ्रेंस कर शिकायत को भाजपा जिलाध्यक्ष ने झूठी रिपोर्ट बताया अब जबकि इस मामले में एफआईआर दर्ज हो गयी है तो भाजपा के नेता बुधवार को कोतवाली का घेराव प प्रदर्शन करेंगे। यह कैसी राजनीति है ? पहले तो पीड़िता को थाने जाने के लिए ललकारा जब वह थाने चली गयी तो थाने में प्रदर्शन और नारेबाजी करेंगे। सवाल यह है कि क्या भाजपा को कानून पर भरोसा नहीं या पार्टी के लोग पुलिस पर दवाब डालकर मामले को भटकाना चाहते हैं? पुलिस पर भरोसा न भी हो तो न्यायालय पर तो भरोसा है, न ! यदि है तो न्याय के राह में रोड़ा बनने के बजाय उसे अपने तथ्यों से गलत साबित करें तो ज्यादा बेहतर होता। या आपने खुद ही तय कर लिया है कि आप सही है।  क्या आपको सही मानकर छोड़ दिया जाए ? क्या कानून आपके मानने या न मानने से चलता है ?

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यही हाल दूसरे मामले का है जिसमें आत्महत्या मामले में गिरफ्तार अमित पाण्डेय को लेकर कांग्रेस के पार्षद और नेता कर रहे हैं। यहां भी दवाब बनाने की कोशिश की जा रही है। पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई की, एक आरोपी की गिरफ्तारी हुई। पुलिस आपकी, सरकार आपका फिर यह दवाब का खेल क्यों? हालांकि इस प्रकरण में भी कई तरह के सवाल हैं, जैसे, पहले दिन पुलिस ने कुछ दस्तावेजों के साथ उक्त पत्र मिलने की बात कही थी लेकिन अब कुछ दस्तावेजों की चर्चा ही नहीं है। पुलिस ने उस पत्र को पहले तो किसी भी मीडिया को नहीं दिया लेकिन यह पत्र रायपुर के मीडिया संस्थानों में पहुंचा दिए गए। इस मामले में शुरू से यह माना जा रहा था अब मामला कोर्ट के परिधि में चला गया । इस मामले में कार्रवाई के बाद भी जो दवाब बनाने के प्रयास हैं वे अनावश्यक लगते है। कई बार ऐसा भी लगता है कि पुलिस की जांच भटक रही है या भटकाई जा रही है।

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हालांकि पुलिस दावा करती है कि जांच निष्पक्ष हो रही है लेकिन उसे अपने ही कई स्टेटमेंट अब याद नहीं है। कई लोगों का मानना है कि पुलिस सही और निष्पक्ष जांच नहीं कर पा रही है। उसने एक आरोपी को गिरफ्तार करके गंगा नहा लिया। अब क्या आगे और जांच की आवश्यकता नहीं है ? और सत्ताधारी दल को घूम-घूमकर पुलिस और कानून के खिलाफ अविश्वास पैदा करने की भी  कोई जरूरत है क्या ? क्या आपने खुद से तय कर लिया है, फैसला ले लिया है, सजा भी तय कर दिया है या कानून पर भरोसा है ?

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दोनों परिस्थितियों में नुकसान कानून और व्यवस्था का है। यदि दोनों प्रकरणों में आपका फोकस न्याय पाना है तो जांच की दिशा मोड़ने के बजाय उसे सही दिशा दीजिये। अपने मन से तय कर के सुनाया गया फैसला न्याय नहीं होता। यदि ऐसा होता तो थाना, पुलिस, कोर्ट, कचहरी की जरूरत नहीं होती। हर कोई अपना फैसला अपने हिसाब से सड़क पर ही करने लगे तब तो समाज और देश का कोई मतलब ही नहीं रहेगा। व्यवस्थाओं का सम्मान और उसपर भरोसा ही समाज को सभ्य बनाता है।








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