रायपुर मुनादी।। प्रदेश में भाजपा को लगातार असफलता मिल रही है। 2018 के बाद 3 विधानसभा उपचुनाव हुए हैं लेकिन उनमें से किसी भी में भाजपा को सफलता नहीं मिली उल्टे उनके हार भी ज्यादा मतों से हुई है। ऐसे में प्रदेश भाजपा को आत्मचिंतन जरूर करना चाहिए कि उनके हार के पीछे कौन सा कारण काम कर रहा है। प्रजातंत्र में विपक्ष का इतना निश्तेज होना अच्छा लक्षण नहीं है।
हालांकि यह कहा जाता है कि उपचुनावों में सत्ताधारी दल का दबदबा रहता ही है लेकिन सिर्फ उन्हीं का दबदबा रहे तो विपक्ष को सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों है। यही नहीं निकाय चुनाव और अन्य निकाय उपचुनावों में भी भाजपा का प्रदर्शन बहुत निराशाजनक रहा है। यह संतोषजनक भी है कि कम से कम छत्तीसगढ़ में भाजपा का धर्म आधारित राजनीति सफल नहीं हो पा रही है। नफरत के बीज तो यहां भी बोए जा रहे हैं लेकिन पौधा आकार नहीं ले पा रहा है।
इसके अलावा प्रदेश नेतृत्व के कई फैसले भी बड़े उटपटांग आये हैं। जैसे रायगढ़ में नगर मंडल अध्यक्ष और जिला भाजपा अध्यक्ष पर छेड़छाड़ के आरोप पार्टी के ही कार्यकर्ताओं ने लगाए थे लेकिन पार्टी ने आरोपी नेताओं पर तो कोई कार्रवाई नहीं की, यहां तक कि उनपर कोई फैसला भ8 नहीं लिया लेकिन इस मामले के पीड़िता को पार्टी से निकाल दिया गया। यह मामला खैरागढ़ उपचुनाव में भी मुद्दा बना था, लेकिन शीर्ष नेतृत्व के द्वारा स्पष्ट फैसला नहीं लिए जाने के कारण भी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि इसका नुकसान रायगढ़ में भी होने की आशंका है।
भाजपा को नफरत के बजाए मुद्दों की राजनीति पर ध्यान देने की आवश्यकता है। भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर जहां कांग्रेस को ट्रेप कर लेती है वहीं छत्तीसगढ़ में खुद कांग्रेस के हाथों ट्रैप हो जाती है। उनके ज्यादातर मुद्दे पर प्रदेश सरकार ने कुंडली मार दिया है। गाय, गोबर, राम, धर्म सब पर फिलहाल कंग्रेस की भूपेश सरकार का कब्जा है। ऐसे में जो जनहित के मुद्दे बचते हैं उसे तो भाजपा को उठाकर आगे चलने चाहिए, लेकिन उन्हें ही एक ही डंडा से लोगों को हांकना आता है।
इज़के अलावा सोशल मीडिया में भाजपा का IT सेल भले महंगाई को लेकर बेतुकी बातें करे लेकिन सच तो यह है कि लोग महंगाई से काफी परेशान हैं। बात सिर्फ डीज़ल और पेट्रोल की ही नहीं बल्कि खाद्यान और रोजमर्रा के जरूरतों की बढ़ती महंगाई का भी है। रोजी मजदूरी करने वालों से लेकर निश्चित वेतन पाने वाला वर्ग महंगाई की चपेट में है और यह सोचने को मजबूर है कि आखिर हम अपना भविष्य कैसे बेहतर करें।
दूसरी ओर भूपेश बघेल ने अपने घोषणापत्र में जो वादे किए थे उसमें से ज्यादातर उन्होंने पूरे किये हैं जबकि भाजपा का रिकॉर्ड इसके ठीक उल्टा है। उन्होंने अपने किये वादे पूरे ही नहीं किए। प्रदेश में न सही राष्ट्रीय परिदृश्य में यह आम धारणा है कि भाजपा अपने वादे पूरे नहीं करती। छत्तीसगढ़ के लोग 15 साल भाजपा की वादाखिलाफी झेल चुके हैं इसलिए वे पूरे मन से उनके साथ खड़े होते नहीं दिखते।
इज़के अलावा छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार ने कई पुख्ता काम किये हैं जिसका लाभ आम लोगों को मिल रहा है। इस सरकार के कई फैसले का लोगों ने स्वागत तक किया है। इस सरकार के 2500 ₹ क्विंटल धान लेने का फैसला तो टॉप पर है ही इसके अलावा गोबर खरीदी अभियान ने इसे अंतिम व्यक्ति के साथ जोड़ दिया है। कर्मचारियों के लिए पुराना पेंशन योजना लागू करने के निर्णय ने इस सरकार और ताकत व मजबूती दी है। ऐसे में भाजपा को आत्मचिंतन करने और नए तरीके से रणनीति बनाने पर विचार करना चाहिए।

