28-April-2022


मुख्यमन्त्री जी ! इनपर भी नकेल कसना जरूरी है, आपके हाथ से लगाम ढीली हुई तो होगा नुकसान, जनप्रतिनिधि ही नहीं इनकी भी तय हो जिम्मेदारी, पढ़िए पूरा विश्लेषण



सत्ता के चालों की मुनादी।। अभी खबर आई है कि मुख्यमंन्त्री भूपेश बघेल ने विधायकों की बैठक ली  और बैठक में  कुछ विधायकों को इस बात के लिए फटकार लगाई की उनका रिपोर्ट कार्ड अच्छा नहीं है इसलिए समय रहते वे अपने काम में सुधार लाएं ताकि अगले चुनाव में  पार्टी का अच्छा परफॉर्मेन्स हो और सरकार बनाई जा सके। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कम से कम 35 विधायकों का रिपोर्ट कार्ड अंदरूनी सर्वे में खराब पाया गया है।

वैसे यह बात अच्छी लगती है कि मुख्यमंन्त्री समय रहते अपने विधायकों को सचेत कर रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि अभी समय है इसलिए आने परफॉर्मेन्स में सुधार करके रिपोर्ट कार्ड दुरुस्त किया जाय। बताया जाता है कि सरकार ने एक अंदरूनी सर्वे  करवाया था जिसमें 35 विधायक के कामकाज को संतोषजनक नहीं माना गया। बताया जाता है कि इन विधायकों के खिलाफ लोगों में नाराजगी है। प्रदेश में कांग्रेस के कुल 71 विधायक हैं ऐसे में यदि 35 विधायकों से जनता नाराज होती है और चुनाव में उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो सरकार बनाना नामुमकिन हो जाएगा।

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2018 में जब विधानसभा चुनाव हुआ था तो कांग्रेस पार्टी को आशातीत सफलता मिली थी। 15 साल से शासन कर रहे भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया था। बड़े-बड़े मंत्री और विधायक चुनाव हार गए थे। वहीं कांग्रेस पार्टी के अनजान चेहरों ने भारी बढ़त के साथ जीत दर्ज किया था। इतनी बड़ी बहुमत मिली कि प्रदेश में एक इतिहास बन गया। लेकिन अंदरूनी सर्वे की माने तो ये जनप्रतिनिधि अपने जनता की अपेक्षा पर खरे ही नहीं उतर पा रहे हैं।

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दरअसल जब किसी को भी इतनी बड़ी बहुमत मिलती है तो जनता के अपेक्षाओं का भी वजन ज्यादा होता है। ऐसे में जनता की सभी अपेक्षाओं पर खरा उतरना बड़े बहुमत वाली सरकार के लिए एक चुनौती होती है। ऐसे में यह लाजमी भी है कि कई विधायक जनता के नाराजगी के लपेटे में हों। लेकिन सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ में क्या लोग अपने काम के लिए सीधे विधायक या अपने जनप्रतिनिधि से मिलते हैं ? जवाब है नहीं। यहां लोगों के काम प्रत्यक्ष रूप से अधिकारी करते हैं और अधिकारियों के क्रियाकलाप से जनता ज्यादा प्रभावित होती है, जनप्रतिनिधियों के क्रिया कलाप से नहीं। अधिकारी यदि सही काम करते हैं तो माहौल सरकार के पक्ष में जाता है अन्यथा विपक्ष में माहौल बनाने में राजनीतिक दल कोई कसर नहीं छोड़ते। कहा जाता है कि बेलगाम नौकरशाही के कारण ही पिछली सरकार का यह हस्र हुआ था।

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दरअसल नौकरशाही और शासकीय तंत्र के पास जनता सीधे जाती है और अपना काम करवाती है ऐसे में यदि उसे वहां परेशानी हो तब सरकार को चिंता करने की बिल्कुल जरूरत है लेकिन सरकार इस पक्ष को नजरअंदाज कर रही है। सरकार के दो चेहरे होते हैं पहला पुलिस और दूसरा राजस्व विभाग जहां जनता का सीधा वास्ता पड़ता है यदि वहां लोगों के साथ न्याय नहीं होता है तो उसका सीधा असर जनता पर और बाद में नाराजगी के रूप में सरकार पर पड़ता है।

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प्रदेश में सरकार के ये दोनों चेहरे बदरंग से दिखने लगे हैं। पुलिस तो फिर भी कई जगह ठीक है लेकिन राजस्व विभाग में जनता के साथ गलत हो रहा है। वहां रिश्वत का दर दो गुना कर दिया गया है और उसका ठीकरा सरकार पर फोड़ा जाता है। अधिकारी यह कहकर रिश्वत लेते है कि ऊपर तक देना पड़ता है। इस बात को लेकर वकीलों का एक समूह आंदोलन भी कर चुका है। ऐसे में यहां पर बदलाव और दुरुस्तीकरण की ज्यादा जरूरत है।

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जहां तक पुलिस की बात है राज्य में पोलिवे के क्रिया कलाप पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। चाहे मामला कवर्धा, सरगुजा या रायगढ़ का हो। रायगढ़ जिले में तो कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रहा है। रायगढ़ जिले की पोलिसिंग जहां इससे पहले ख्याति प्राप्त कर रही थी तो वहीं अब यहां के पोलिसिंग पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। कहा यह जा रहा है कि रसूखदार और अमीर लोगों को पुलिस का संरक्षण है, यह कई मामलों में दिख भी रहा है। हालांकि यहां विधायक के बेटे की गिरफ्तारी तो हो जाती है लेकिन भाजपा जिलाध्यक्ष को पीड़िता को मानहानि का भारी भरकम नोटिस देकर धमकाने और जमानत लेने के लिए भरपूर समय दे दी जाती है, आरोपी की अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद भी गिरफ्तारी न होना लोगों में कौतूहल और सवाल का सबब बन जाती है। यही एक नेत्री के आत्महत्या के मामले में  पुलिस की अजीब सी चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। ऐसे में कुछ जिम्मेदारी उनपर भी होनी चाहिए।

भाजपा सांसद सन्तोष पाण्डेय लगातार प्रशासनिक बैठकों में होते हैं, नारा, जुलूस निकाल रहे हैं लेकिन वहां की पुलिस उन्हें फरार बताती है। हमारे मुख्यमंन्त्री जब विपक्ष में थे तब ऐसे मसलों पर सरकार को खूब लताड़ लगाते थे, आज वे सत्ता में हैं लेकिन पुलिस की कार्यशैली नहीं बदली। इसी तरह और कई मामले हैं। जरूरत इस बात की है कि सरकार के चेहरे समझे जाने वाले इन दो विभाग और उनसे जुड़े अफसरों की रिपोर्ट कार्ड पर भी सरकार नजर रखे और जिम्मेदारी तय करे।

भाजपा शासन में भाजपा कार्यकर्ता सरकार की योजनाओं को लेकर गांव-गांव और घरों में पहुंच जाता था। वो उन्हें बताता था कि उनकी सरकार उनके लिए क्या-क्या कर रही है लेकिन इस सरकार की अच्छी योजनाओं को लेकर  इनके कार्यकर्ता कहीं नहीं पहुंच रहे। चाहे मजदूर कार्ड बनाना हो, भूमिहीन मजदूरों की योजना हो, श्रम कार्ड बनवाने हो, इसमें सिर्फ अधिकारियों की इन्वॉल्वमेंट है। यदि इन योजनाओं में आपके कार्यकर्ता इन्वॉल्व हों तो शायद आपके काम के नाम पर ही लोग आपकी पार्टी के दीवाने हो जाएं और इसका लाभ भी दिखे।

देश में बहुत कम ऐसी सरकारें हैं जो लोक कल्याणकारी योजनाओं के दम पर पुनः सरकार बनाने की क्षमता रखती है, उनमें से एक छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार भी है। ऐसे में सरकार की योजनाएं आम लोगों तक पहुंचे और लोगों तक इन योजनाओं को कांग्रेस कार्यकर्ता ले जाएं तो लोगों से सरकार की सीधी कनेक्टिविटी बनती है। सिर्फ अधिकारियों और कर्मचारियों के बदौलत इसे करना लोगों से सीधे सरकार को जोड़ने में कमजोर कड़ी साबित होगी।

सरकार के ज्यादातर अधिकारी अभी भी संघी मानसिकता के हैं और वे वर्तमान सरकार को कमजोर करने में लगे हैं। यदि सरकार फिर से रिपीट होती है तो शायद ऐसे अधिकारियों की संख्या कम हो लेकिन अभी से सरकार को ऐसे अधिकारियों को चिन्हित करना चाहिए । फील्ड में सरकार और जनता के प्रति समर्पित अधिकारियों को ही लाया जाना चाहिए।








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