01-February-2020


ग्रामीणों का आरोप बड़ा आरोप, कोयला कम्पनी को लाभ पहुंचाने हो रहा षड्यंत्र, नियम विपरीत इश्तिहार जारी कर .....अफसरों की भूमिका पर उठा सवाल .....पढें पूरी खबर ....कोयले के खेल में इनके भी ......



नियम विपरीत इश्तिहार का हुआ प्रकाशन, ग्रामीणों ने तहसील कार्यालय में सौंपा ज्ञापन, कंपनियों को लाभ पहुँचाने हो रहा सड़यंत्र

धरमजयगढ़ मुनादी असलम खान ।

रायगढ़ जिले के कोल माइनिंग सेक्टर में बड़ा खेल चल रहा है। इसमें अफसरों की भी भूमिका संदिग्ध है। तभी तो हाथियों द्वारा १२९ ग्रामीणों के मारे जाने और ४३ हाथियों की मौत के बावजूद धरमजयगढ़ के जंगल को उनका रहवास नहीं माना गया है।
वन मंडल की यही रिपोर्ट कोयले की खदानों के लिए आधार बनी।इससे आगे बढ़कर अब आडर्श आचार संहिता के दौरान ईश्तहार का प्रकाशन और उस पर अफसरों की खामोशी से सारी साजिशें उजागर हो रही हैं।

इसी मुद्दे को लेकर गुरुवार को बायसी कालोनी के ग्रामीणों ने तहसीलदार कार्यालय पहुंचकर आपत्ति डर्ज कराई। उनका कहना है कि नियमों के विपरीत आडर्श आचार संहिता लागू होने के बावजूद ईश्तहार का प्रकाशन किया गया। बड़ी बात ये कि इसकी जानकारी दुर्गापुर, धरमजयगढ़, तराईमाल और बायसी जैसे प्रभावित गांवों के ग्रामीणों को नहीं दी गई। इसे लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उन्हें शांत करने के बजाय गुमराह किया जा रहा है। बायसी के ग्रामीण सजल कुमार मधु का कहना है कि तहसील कार्यालय का बाबू ईश्तहार निरस्त किए जाने की बात कहता है, लेकिन अफसर ऐसे किसी आदेश की जानकारी नहीं दे रहे। कुल मिलाकर कंपनियों को फायदा पहुंचाने की नीयत से षडय़ंत्र के तहत सारा खेल खेला जा रहा है।

दोबारा करें प्रकाशन या इसे मानें आपत्ति

ग्रामीणों का कहना है कि ९ जनवरी को ईश्तहार का प्रकाशन हुआ, जिसमें अंतिम तारीख ३० जनवरी थी। जानकारी मिलते ही बायसी के ग्रामीण तहसील कार्यालय पहुंचे और कहा कि ईश्तहार का प्रकाशन दोबारा करें, और अगर नहीं करते हैं तो इसे ही हमारी आपत्ति मानें।

डीएफओ ने लिखा-

इस मामले में डीएफओ ने रिपोर्ट में लिखा है की केवल जल स्रोत के करीब आते हैं हाथी
जिस धरमजय के जंगल में 2001से अब तक 129 ग्रामीणों की मौत हाथियों के कारण हुई और उसी जंगल में 2005 से अब तक 43 हाथी मारे गए, उसे तत्कालीन डीएफओ ने हाथियों का रहवास नहीं माना।

वनसंरक्षक को भेजी गई रिपोर्ट में उन्होंने लिखा कि प्रस्तावित क्षेत्र का घनत्व 0.4 से कम है। वहां कोई जलस्रोत नहीं है। क्षेत्र में बायोस्फीयर रिजर्व, नेशनल पार्क, वन्य प्राणी अभ्यारण्य, हाथी रहवास अथवा हाथी कॉरीडोर नहीं है। केवल जलस्रोतों के आसपास जंगली हाथियों का आवागमन रहता है। इधर सजल मधु का कहना है कि जंगल में हाथी रहते ही हैं। खदान क्षेत्र में भी हाथी ने एक व्यक्ति को मारा था। गुरुवार को भी चार हाथी उस क्षेत्र में मौजूद रहे।

किसानों को दो फसली जमीन छिनने सता रहा डर

बताया गया कि 1956 में पूर्वी पाकिस्तान से आए बंगाली समुदाय को केंद्र शासन ने पांच से सात एकड़ जमीन देकर विस्थापित किया था। बंजर जमीन को किसानों ने दो फसली बनाया। आज वहीं के खेतों से तरबूज, परवल, मक्का आदि की सप्लाई पूरे भारत में हो रही है। किसानों को डर है कि खदान शुरू होने से उन्हें दोबारा विस्तापित किया जाएगा। ऐसे में उन्हें इस बात का डर है की उनकी जमीन छीन ली जाएगी।

संहिता की बात सुनते ही तहसीलदार ने काटा फोन

तहसीलदार नीतू भगत ने पहले तो किसी तरह की लिखित आपत्ति मिलने से साफ इनकार कर दिया। फिर आचार संहिता के दौरान नियम विरुद्ध ईश्तहार के प्रकाशन को लेकर पूछे गए सवाल के बाद वह खामोश हो गईं और फोन काट दिया। इसके बाद दोबारा कॉल रिसीव नहीं किया।कुल मिलाकर देखा जाए तो इसमें प्रशासनिक अधिकारी और कंपनियों के मिलीभगत की बू आ रही है आगे देखने वाली बात होगी की ग्रामीणों द्वारा सौंपे शिकायत ज्ञापन पर क्या कार्यवाही होती है ?








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