01-February-2020


बजट 2020 को लेकर उठने लगे सवाल बताया खोखली और बड़ी बड़ी बात करने की कोशिश ......मौलिक मुद्दों पर .....बुनियादी समस्याओं व जरूरतों से बहुत दूर ....पढें क्या कहते हैं ....



केंद्रीय बजट में धरातल से उठकर खोखली बड़ी बड़ी बातें करने की कोशिश की गई वस्तुतः बजट 2020, अर्थशास्त्रियों व समाज शास्त्रियों के दृष्टिकोण से काफी निराशाजनक ही नहीं है वरन् बुनियादी समस्याओं व जरूरतों से बहुत दूर है मौलिक मुद्दों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है।यह बजट और अधिक आर्थिक संकट उत्पन्न करेगा।समाजिक और आर्थिक ढांचा कमजोर होगा।

देश की अर्थव्यवस्था ,रोजगार,शिक्षा,गरीबी,कृषि,कलाधन,मंहगाई, गरीब जनता,कर्मचारी और मध्यम वर्गीय परिवार के संसाधनों व क्रय शक्ति को बढ़ाने की योजना व दिशा बिल्कुल स्पष्ट नहीं है।
इस बजट से गरीब और अमीर के बीच की खाई और बढ़ेगी।क्योंकि समाजिक कल्याण की योजनाओं के बजट में कटौती की गई है और कार्पोरेट्स के हितों को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया है।मनरेगा में लगभग दस हजार करोड़ की कटौती की गई। वहीं कार्पोरेट्स कर को घटाकर 15% किया गया है।

राष्ट्रीयकृत सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने का निर्णय लिया गया है।सबसे अधिक लाभ अर्जित करने तथा सरकार को बड़ी लाभांश देने वाली संस्था एल आई सी के शेयर पूंजी का हिस्सा बेचने का प्रस्ताव है । पी पी पी मॉडल के तहत पांच शहरों को विकसित करने का प्रस्ताव है।इसका मतलब है कि आम जनता के कल्याण की प्रतिबद्धता से हटकर सरकार बड़े पूंजीपतियों के हाथो देश को बेचने की तैयारी कर रही है जो काफी ख़तरनाक है।

सरकार ने पिछले बैजट के बहुत से प्रस्ताव जो समाजिक हित में थे वे केवल कागजों में रह गई अभी तक पूरी नहीं हुई है।उन प्रस्तावित कार्यक्रमो के बजट का क्या होगा सरकार मौन है।कर्मचारियों का विशेष ध्यान आयकर सुविधा पर होती परन्तु आयकर में कोई विशेष छूट या सुविधा न देकर उसके स्लैब को और अधिक जटिल कर दिया गया है। रोजगार को बढ़ाने की कोई ठोस नीति भी इस बजट में दिखाई नहीं पड़ती।

आंगन बाड़ी जैसे शासकीय योजनाओं में कार्यरत कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति को बेहतर करने की कोई योजना नहीं बल्कि मोबाइल मुहैया कराकर काम के बोझ को बढ़ाने की योजना है।उन्हें समान काम समान वेतन के संवैधानिक अधिकार से भी वंचित किया जा रहा है।ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की मजबूती के लिए भी कोई कारगर योजना स्पष्ट नहीं है केवल सुंदर शब्दों और सपनों से भरा बजट है।जो पूंजीपतियों और कार्पोरेट्स को सीधे लाभ पहुंचाने वाला है।

किसानों की एक प्रमुख मांग थी कि उनके फसल का उचित मूल्य दिया जाय, स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू की जाए परन्तु इस बजट में उनके सपनों को तोड़ा गया है। शिक्षा, कालाधन ,मंहगाई पर रोक थाम,की कोई ठोस योजना नहीं है।
कुल मिलाकर यह बजट काफी निराशाजनक दिशाहीन hएवं अर्थव्यवस्था के संकट को और अधिक बढ़ाएगा।

गणेश कच्छवाहा
संयोजक
ट्रेड यूनियन कौंसिल रायगढ़ छत्तीसगढ़
9425572284








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