06-February-2020


जशपुर में ...अजब चुनाव की गजब कहानी, पहले चुनाव चिन्ह बदल दिया, फिर चुनाव स्थगित करवाई लेकिन दो दिन बाद अचानक कर दिया सरपंच घोषित, पढ़िए पूरी खबर



जशपुर मुनादी।।

जशपुर जिले के एक ग्राम पंचायत में लोकतंत्र पर प्रशासन का ऐसा डंडा चला कि लोकतंत्र यहां त्राहि त्राहि करती दिख रही है।नियमो की आड़ लेकर प्रशासन लोकतंत्र की बोलती बंद करने के लिए किस हद तक जाती है इसका पुख्ता उदाहरण जानना हो तो फरसाबहार जनपद पंचायत के घुमरा ग्राम पंचायत में सोमवार को हुए सरपंच के चुनाव की कहानी सुन लिजिये।

https://youtu.be/1g29_tVY0pA

यह कहानी एक ऐसे सरपँच प्रत्याशी की है जो पूरे एक महीना बोरिंग छाप चुनाव चिन्ह के नाम पर गाँव मे घूम घूम कर अपना प्रचार करता है और जब मतदान का समय आता है तो मतदान के 2 महीने पहले से मतदान की पूरी तैयारी कर कर रहे प्रशासन के प्रहरियों की घोर लापरवाही के चलते इस प्रत्याशी का चुनाव चिन्ह बदलकर बोरिंग छाप से नारियल छाप हो गया ।गनीमत थी 12 ही वोट पड़े थे कि इस छाप के प्रत्याशी दिनेश्वर साय को पता चल गया और उन्होंने आपत्ति दर्ज करा दी और मौके पर पहुंचकर रिटर्निंग ऑफिसर ने सरपँच का मतदान रुकवा दिया बाकी प्रत्याशियों के मतदान सुचारू रूप से चलता रहा ।सरपँच का मतदान रुका रह गया और कूल पड़े 12 मतदान में एक मतपत्र रिजेक्ट होने के बाद 11 मतों पर दिनेश्वर साय को छोड़ 2 अन्य सरपँच प्रत्याशियों में हेड टेल करके किसी नरहरी देहरी को सरपंची का सर्टिफीट दे दिया। अब चुनाव चिन्ह बदले जाने के पीड़ित सरपँच प्रत्याशी दिनेश्वद साय चाहता है कि यहाँ दुबारा मतदान हो क्योंकि किसी ने अधिकारियो ने साजिश रचकर ठीक समय पर चुनाव चिन्ह बदल दिए है ।उसका कहना है कि पूरे गाव वालों की सहमति से यहँ का सरपँच उम्मीदवार बनवाया गया था और उसकी जीत निश्चित थी ये इस बात की जानकारी साजिश रचने बालों को अच्छे से थी इसलिए उन्होंने सांठ गांठ करके चुनाव चिन्ह ही बदल ढिये।उन्होंने प्रमाण के तौर पर उन्हें रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा दिए गए चुनाव चिन्ह की दो प्रतियां दिखाईं दोनो प्रतियां 9 जनवारी 2020 को जारी हुई दोनो में रिटर्निंग ऑफिसर के हस्ताक्षर भी हैं लेकिन एक प्रति में दिनेश्वर साय के नाम के आगे उसका चुनाव चिन्ह बोरिंग है और दूसरे प्रति चुनाव निशान बदलकर नारियल हो जाता है इसलिए उसे पक्का यकीन है कि किसी ने साजिश रचकर ऐसा जान बूझकर करवाया है और प्रशासन भी उस साजिश में शामिल है नही तो आज जीत उसकी होती सरपंची का जश्न वो मना रहा होता ।

उसकी माने तो उसने तहसीलदार फरसाबहार के समक्ष उसी दिन आपत्ति दर्ज करा दी थी और कल मतदान भंग कर दुबारा मतदान कराए जाने की लिखित में फरियाद लेकर कलेक्टर के पास भी पहुंचा । कलेक्टर ने उसे यहां दुबारा मतदान कराने का भरोसा भी दे दिया लेकिन इसी बीच बुधवार को टाई कराकर सरपँच प्रत्याशी नरहरी देहरी को सरपँच का प्रमाण पत्र दे दिया गया। प्रशासन के इस रवैये से पूरा गांव आक्रोशित हो उठा है और गाँव के लोग इसको लेकर आंदोलन छेड़ने की तैयारी कर रहे है ।

सवाल ये है कि चुनाव चिन्ह बदले जाने जैसी बड़ी चूक कैसे हो गयी और इतनी बड़ी चूक की किसने और इससे बड़ा सवाल ये की चुनाव डयूटी में छोटी छोटी लापरवाही उजागर होने पर कई छोटे छोटे सरकारी कर्मचारियों पर तत्काल कार्यवाही का डंडा चलाने वाला निर्वाचन आयोग इस बड़ी चूक को इतने हल्के में क्यों ले रहा है ?

दिनेशकर साय चुनाव जीतता या नही जीतता लेकिन चुनाव लड़ने के अधिकार से उसे एकबारगी वंचित कर देना ये लोकतंत्र की दिनदहाड़े हत्या कर देने का प्रत्यक्ष नमूना है । निर्वाचन आयोग से अगर चूक हुई तो इसका खामियाजा दिनेश्वर साय जैसे भोले भाले ग्रामीण क्यों भुगते और फिर जब निर्वाचन आयोग की नियमावली पुनर्मतदान की अनुमति देती है फिर यहां पुनर्मतदान कराने में दिक्जत किस बात की ? ऐसे ऐसे न जाने कितने सवाल हैं जिसके जवाब का न केवल एक दिनेश्वर साय बल्कि कई लोगो को इंतज़ार है।








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