नरेंद्र पर्वत(व्याख्याता) के विचारों की मुनादी।। जब कोई सार्वजनिक मंच पर बैठा व्यक्ति शिक्षकों के सम्मान को कमतर आंकने वाली टिप्पणी करता है, तो वह केवल एक पेशे का नहीं, बल्कि पूरे समाज के बौद्धिक आधार का अपमान करता है। हाल ही में एक प्रतिष्ठित पत्रकार के कथित बयान को लेकर जो बहस उठी है, उसने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है— क्या आज का मीडिया उस वर्ग का सम्मान करना भूलता जा रहा है, जिसने इस देश के हर सफल व्यक्ति को गढ़ा है?
विडंबना देखिए। एक शिक्षक वर्षों तक बच्चों को पढ़ाता है, उनके व्यक्तित्व का निर्माण करता है, उनमें तर्क, विवेक और अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित करता है। वही छात्र आगे चलकर पत्रकार, मंत्री, न्यायाधीश, वैज्ञानिक और उद्योगपति बनते हैं। लेकिन जब समाज में प्रतिष्ठा और प्रभाव का प्रश्न आता है, तो सबसे पहले उपेक्षा का शिकार वही शिक्षक होता है जिसने इन सभी को खड़ा किया।
यदि शिक्षक "दो कौड़ी" के हैं, तो फिर यह भी पूछना चाहिए कि देश के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, न्यायालयों, संसदों और समाचार कक्षों में बैठे लोग किसने तैयार किए? क्या वे स्वयं उत्पन्न हो गए थे? क्या किसी पत्रकार की भाषा, तर्कशक्ति और विश्लेषण क्षमता बिना किसी शिक्षक के विकसित हो गई?
दुखद यह नहीं है कि कोई व्यक्ति ऐसा कथन कर दे। दुखद यह है कि ऐसे कथन उस समय सामने आते हैं जब भारत स्वयं को "ज्ञान महाशक्ति" बनाने की बात कर रहा है। एक ओर सरकारें शिक्षा को विकास की कुंजी बताती हैं, दूसरी ओर समाज के प्रभावशाली वर्गों से ऐसे संदेश जाते हैं जो शिक्षकों की सामाजिक प्रतिष्ठा को कमजोर करते हैं।
भारत का इतिहास शिक्षकों के योगदान से भरा पड़ा है। चाणक्य ने साम्राज्य गढ़ा, सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक क्रांति की नींव रखी, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने शिक्षक को राष्ट्र की आत्मा कहा। दुनिया की हर बड़ी क्रांति के पीछे विचार थे, और हर विचार के पीछे कोई शिक्षक।
मीडिया का काम प्रश्न पूछना है, लेकिन प्रश्न पूछने और किसी वर्ग का अवमूल्यन करने में अंतर होता है। यदि शिक्षा व्यवस्था में कमियां हैं तो उन पर बहस होनी चाहिए। यदि कुछ शिक्षक अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं तो उनकी आलोचना होनी चाहिए। लेकिन पूरे शिक्षक समुदाय को तिरस्कार की दृष्टि से देखना बौद्धिक आलस्य का परिचायक है, गंभीर विमर्श का नहीं।
आज भी देश के लाखों शिक्षक सीमित संसाधनों, कम सुविधाओं और बढ़ते गैर-शैक्षणिक कार्यों के बीच शिक्षा की मशाल जलाए हुए हैं। जनगणना हो, चुनाव हो, आपदा प्रबंधन हो या सामाजिक जागरूकता अभियान—सरकार और समाज को सबसे पहले शिक्षक ही याद आते हैं। जब जिम्मेदारी बांटनी होती है तो शिक्षक सबसे योग्य दिखाई देते हैं, लेकिन जब सम्मान देने की बारी आती है तो कुछ लोगों को उनकी कीमत "दो कौड़ी" लगती है।
सच यह है कि शिक्षक की कीमत बाजार तय नहीं करता, इतिहास तय करता है। और इतिहास का निर्णय स्पष्ट है—सभ्यताएँ सेनाओं से सुरक्षित हो सकती हैं, लेकिन उनका निर्माण शिक्षकों से ही होता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि शिक्षक कितनी "कौड़ी" के हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम एक ऐसे समाज में बदल रहे हैं जो अपने सबसे बड़े निर्माता को पहचानने की क्षमता खोता जा रहा है? यदि ऐसा है, तो संकट शिक्षकों का नहीं, समाज की स्मृति और संवेदनशीलता का है।