ओडिशा में दरकता बीजद का किला, नवीन पटनायक की राजनीतिक विरासत संकट में है?

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June 02, 2026



ओडिशा में दरकता बीजद का किला, नवीन पटनायक की राजनीतिक विरासत संकट में है?

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सतीश शर्मा की मुनादी।। ओडिशा की राजनीति में कभी अजेय माने जाने वाले बीजू जनता दल (बीजद) के भीतर इन दिनों असंतोष, टूट और नेतृत्व संकट की आवाजें तेज होती जा रही हैं। करीब ढाई दशक तक सत्ता पर एकछत्र राज करने वाली पार्टी आज ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां उसके भविष्य को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

 "सिर मुंढाते ही ओले पड़े" कहावत बीजद के लिए पूरी तरह सत्य सिद्ध होती दिख रही है। 2024 के आम चुनाव में राज्य सत्ता गंवाने और लोकसभा में एक भी सीट जीतने में विफल होने के बाद दल को राज्यसभा में झटके लगने शुरू हो गये। 2024 में सत्ता गंवाते ही बीजद के दो सांसदों ममता महतो और फिर सुजीत कुमार ने दल से इस्तीफा दे दिया।  दोनों भाजपा में शामिल हुए टिकट लिया और फिर राज्यसभा पंहुच गए। और अब 25 मई  को बीजू जनता दल के एक और वरिष्ठ नेता एवं राज्यसभा सांसद देबाशीष सामंतराय  ने बीजद की प्राथमिक सदस्यता  और राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया और अगले ही दिन भारतीय जनता पार्टी  में शामिल हो गए। आशा की जा रही है कि भाजपा उन्हें ही उपचुनाव में दलीय प्रार्थी बनाएगी।

देबाशीष के इस्तीफे के बाद  राज्यसभा में बीजद सांसदों की संख्या छः से घटकर पांच हो गई है। भाजपा के फिलहाल चार सांसद हैं। उपचुनाव के बाद भाजपा सांसदों की संख्या भी  पांच हो जायेगी।


सत्ता से बाहर होने के साथ ही पार्टी के भीतर दबे असंतोष ने खुलकर सामने आना शुरू कर दिया है। वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी, लगातार दल-बदल, क्रॉस वोटिंग और संगठनात्मक कमजोरी ने यह संकेत देना शुरू कर दिया है कि ओडिशा की राजनीति में एक बड़ा बदलाव चल रहा है।


सत्ता गई, तो बिखरने लगी पकड़ 

बीजद ने वर्ष 2000 से लेकर 2024 तक ओडिशा की राजनीति पर लगभग निर्विरोध नियंत्रण बनाए रखा। नवीन पटनायक की साफ-सुथरी छवि, कल्याणकारी योजनाएं और कमजोर विपक्ष ने पार्टी को लगातार मजबूत बनाए रखा। लेकिन 2024 के चुनाव परिणामों ने पहली बार बीजद की राजनीतिक नींव को हिला दिया।

लोकसभा में एक भी सीट न जीत पाना और विधानसभा की सत्ता खो देना केवल चुनावी हार नहीं थी, बल्कि यह उस राजनीतिक संरचना के टूटने का संकेत था, जो वर्षों से नवीन पटनायक के नेतृत्व के इर्द-गिर्द खड़ी थी।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सत्ता से बाहर होते ही पार्टी के भीतर दबे असंतोष ने विस्फोटक रूप ले लिया। कई नेता अब खुलकर यह आरोप लगाने लगे हैं कि संगठन में पुराने और ज़मीनी नेताओं की उपेक्षा की गई तथा पार्टी का नियंत्रण कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित हो गया।


पांडियन फैक्टर बना विवाद की जड़  

बीजद के भीतर सबसे अधिक चर्चा पूर्व आईएएस अधिकारी वी.के. पांडियन की भूमिका को लेकर हो रही है। वर्षों तक नवीन पटनायक के सबसे करीबी सहयोगी रहे पांडियन पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने धीरे-धीरे पार्टी और सरकार दोनों पर अत्यधिक नियंत्रण स्थापित कर लिया।

वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी का बड़ा कारण यही बताया जा रहा है कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं की जगह नौकरशाही शैली में संगठन चलाया जाने लगा। कई नेताओं का आरोप है कि पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित होती चली गई और क्षेत्रीय नेताओं का महत्व कम हो गया।

राज्यसभा सांसद पद से इस्तीफा देने वाले देबाशीष सामंतराय ने भी खुलकर आरोप लगाया कि पिछले एक वर्ष से उन्हें नवीन पटनायक से मिलने तक नहीं दिया गया और पार्टी पर अब भी पांडियन का प्रभाव बना हुआ है।


राज्यसभा से शुरू हुआ राजनीतिक पलायन

बीजद के लिए सबसे बड़ा झटका उसके राज्यसभा सांसदों के लगातार इस्तीफों के रूप में सामने आया। 2024 में सत्ता गंवाने के बाद ही सबसे पहले ममता महंत और सुजीत कुमार ने पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। इसके बाद मई 2026 में वरिष्ठ नेता देबाशीष सामंतराय ने भी पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होकर राजनीतिक हलचल बढ़ा दी।सामंतराय के इस्तीफे के बाद राज्यसभा में बीजद सांसदों की संख्या छह से घटकर पांच हो गई है।  भाजपा के चार सांसद हैं जो उपचुनाव में के बाद बढ़कर पांच हो जायेगा।


अनुशासनात्मक कार्रवाई भी बेअसर 

बीजद नेतृत्व ने बागियों को रोकने के लिए कई नेताओं और विधायकों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की, लेकिन उसका अपेक्षित असर नहीं दिखा। राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के आरोप में छह विधायकों को निलंबित किया गया। इससे पहले भी कई नेताओं पर कार्रवाई हुई। बावजूद इसके, पार्टी छोड़ने वालों की संख्या लगातार बढ़ती रही।

भद्रक की पूर्व सांसद मंजुलता मंडल, पूर्व विधायक मुक्तिकांत मंडल, सनातन महाकुड़ और अरविंद महापात्र जैसे नेताओं पर कार्रवाई ने यह साफ कर दिया कि बीजद के भीतर असंतोष गहरा चुका है।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई नेता खुलकर भाजपा और मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी की प्रशंसा करते दिखाई दिए।


भाजपा का बढ़ता आत्मविश्वास 

बीजद की कमजोरी का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ भाजपा को मिलता दिखाई दे रहा है।

2024 के बाद भाजपा ने न केवल सत्ता पर कब्जा किया, बल्कि बीजद के पारंपरिक गढ़ों—जाजपुर, भद्रक, केंद्रापड़ा और केओंझर—में भी तेजी से संगठन विस्तार शुरू कर दिया। पंचायत स्तर के अनेक नेता और कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो रहे हैं।

नुआपाड़ा उपचुनाव में भाजपा की रिकॉर्ड जीत ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य की राजनीति का समीकरण बदल रहा है। राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के जरिए निर्दलीय दिलीप राय को जिताना भी भाजपा की रणनीतिक सफलता माना गया।


फिर भी खत्म नहीं हुई बीजद 

इन सबके बावजूद बीजद को पूरी तरह समाप्त मान लेना जल्दबाजी होगी। आज भी ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में पार्टी का मजबूत आधार मौजूद है। नवीन पटनायक की व्यक्तिगत लोकप्रियता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। गरीब और महिला मतदाताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता अब भी बनी हुई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बीजद समय रहते संगठनात्मक सुधार, नेतृत्व में स्पष्टता और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद स्थापित कर लेती है, तो वह वापसी कर सकती है।

लेकिन चुनौती यह है कि पार्टी अब उस दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां केवल नवीन पटनायक की छवि के सहारे राजनीति चलाना कठिन होता जा रहा है।


सबसे बड़ा सवाल — नवीन के बाद कौन?


बीजद के सामने सबसे बड़ा संकट उत्तराधिकार का है।

नवीन पटनायक अब उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में पार्टी के भीतर यह सवाल लगातार उठ रहा है कि भविष्य में बीजद का नेतृत्व कौन संभालेगा। अब तक पार्टी इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाई है। यही अनिश्चितता नेताओं और कार्यकर्ताओं के भीतर असुरक्षा की भावना को बढ़ा रही है। 

2027 पंचायत चुनाव होंगे निर्णायक

राजनीतिक विशेषज्ञों की नजर अब 2027 के पंचायत चुनावों पर टिकी है। यही चुनाव तय करेंगे कि बीजद अभी भी जमीनी स्तर पर मजबूत है या भाजपा ने गांवों तक अपनी पकड़ मजबूत कर ली है।

यदि पंचायत स्तर पर भी बीजद कमजोर प्रदर्शन करती है, तो पार्टी के भीतर टूट और तेज हो सकती है। लेकिन यदि वह ग्रामीण आधार बचाने में सफल रहती है, तो ओडिशा की राजनीति में उसकी वापसी की संभावना बनी रहेगी।

फिलहाल इतना तय है कि ओडिशा की राजनीति एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है। कभी अभेद्य माने जाने वाले बीजद के किले में दरारें साफ दिखाई देने लगी हैं। अब देखना यह होगा कि नवीन पटनायक इस संकट को संभाल पाते हैं या ओडिशा की राजनीति एक नए युग में प्रवेश करने जा रही है।

 


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