डॉ. नरेन्द्र पर्वत की मुनादी।। भारत वर्ष 2047 तक "विकसित राष्ट्र" बनने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है। पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, विश्वस्तरीय आधारभूत संरचना, डिजिटल क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा और वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की महत्वाकांक्षाएँ निश्चित ही स्वागतयोग्य हैं। किंतु एक बुनियादी प्रश्न है—क्या इन सबका आधार बनने वाली शिक्षा व्यवस्था उतनी ही मज़बूत हो रही है?
इतिहास बताता है कि कोई भी देश केवल आर्थिक निवेश से विकसित नहीं बना। जापान, दक्षिण कोरिया, फ़िनलैंड, सिंगापुर और हाल के दशकों में चीन ने सबसे पहले विद्यालयों, शिक्षकों, अनुसंधान और मानव पूँजी में निवेश किया। भारत भी यदि विकसित राष्ट्र बनना चाहता है, तो उसे शिक्षा को व्यय नहीं, बल्कि सबसे बड़ा राष्ट्रीय निवेश मानना होगा।
इसी संदर्भ में पिछले कुछ वर्षों में सरकारी विद्यालयों के समेकन (School Rationalisation) और कम नामांकन वाले विद्यालयों के विलय की नीति व्यापक चर्चा का विषय बनी है। UDISE के आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2017-18 से 2023-24 के बीच सरकारी विद्यालयों की संख्या लगभग 10.95 लाख से घटकर 10.16 लाख रह गई। अर्थात लगभग 79 हजार विद्यालय कम हुए। सरकार का कहना है कि इनमें बड़ी संख्या ऐसे विद्यालयों की थी जहाँ बहुत कम विद्यार्थी थे, इसलिए उन्हें निकटवर्ती विद्यालयों में मिलाकर संसाधनों का बेहतर उपयोग किया गया।
यह तर्क प्रशासनिक दृष्टि से उचित प्रतीत हो सकता है, किंतु शिक्षा केवल प्रशासनिक गणित नहीं है। विद्यालय किसी भवन का नाम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का सबसे प्रभावी माध्यम है। किसी गाँव या आदिवासी बस्ती का विद्यालय वहाँ के बच्चों को केवल अक्षरज्ञान नहीं देता, बल्कि उन्हें गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक वंचना के दुष्चक्र से बाहर निकलने का अवसर भी देता है।
क्या विद्यालयों का विलय वास्तव में नुकसान पहुँचाता है ? -
इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। यदि दो कमज़ोर विद्यालयों को मिलाकर बेहतर शिक्षक, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल मैदान और डिजिटल सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं तथा बच्चों के लिए सुरक्षित परिवहन भी सुनिश्चित किया जाता है, तो समेकन शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ा सकता है।
लेकिन यदि विद्यालयों का विलय केवल व्यय कम करने का साधन बन जाए और परिणामस्वरूप बच्चों को कई किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़े, तो इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब परिवारों पर पड़ता है। अनेक अध्ययनों में पाया गया है कि विद्यालय की दूरी बढ़ने पर विशेषकर बालिकाओं, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, आर्थिक रूप से कमजोर तथा प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थियों में विद्यालय छोड़ने की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए किसी भी समेकन नीति का मूल्यांकन केवल बचाई गई राशि से नहीं, बल्कि बच्चों की वास्तविक पहुँच और सीखने के परिणामों से होना चाहिए।
शिक्षा पर खर्च वृद्धि हुई, पर क्या पर्याप्त है -
हाल के केंद्रीय बजट में समग्र शिक्षा योजना के लिए आवंटन में वृद्धि की गई है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि शिक्षा का बजट घट गया है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह वृद्धि भारत जैसी विशाल आबादी और बढ़ती शैक्षिक आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा पर GDP का लगभग 6 प्रतिशत सार्वजनिक व्यय करने की दिशा में बढ़ने की बात कही है। वास्तविकता यह है कि भारत का कुल सार्वजनिक शिक्षा व्यय अभी भी लंबे समय से इस लक्ष्य से नीचे बना हुआ है। परिणामस्वरूप अनेक विद्यालयों में आज भी पर्याप्त शिक्षक, विज्ञान प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, खेल सुविधाएँ, विशेष शिक्षकों की उपलब्धता और डिजिटल संसाधनों का अभाव है।
शिक्षा पर खर्च को केवल बजटीय राशि से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक क्रय-शक्ति, महँगाई, छात्र संख्या और सीखने के परिणामों के आधार पर आँकना चाहिए। यदि संसाधनों की आवश्यकता उससे अधिक गति से बढ़ रही हो जितनी तेजी से बजट बढ़ रहा है, तो नाममात्र की वृद्धि भी व्यवहार में अपर्याप्त सिद्ध हो सकती है।
मानव संसाधन भारत की सबसे बड़ी पूँजी -
भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में है। इसे "Demographic Dividend" कहा जाता है। लेकिन जनसंख्या तभी लाभांश बनती है जब वह शिक्षित, स्वस्थ और कुशल हो। अन्यथा वही जनसंख्या बेरोज़गारी, कम उत्पादकता और सामाजिक असमानता का कारण बन सकती है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, रोबोटिक्स, जैव-प्रौद्योगिकी, क्वांटम कंप्यूटिंग और स्वचालन का युग है। भविष्य की नौकरियाँ केवल डिग्री नहीं, बल्कि समस्या-समाधान, वैज्ञानिक सोच, भाषा दक्षता, डिजिटल कौशल और नवाचार क्षमता की माँग करेंगी। इन क्षमताओं की नींव प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पड़ती है।
यदि विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर होगी तो विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, उद्योगों और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र पर भी उसका प्रभाव दिखाई देगा। मानव पूँजी का निर्माण किसी एक विश्वविद्यालय में नहीं, बल्कि पहली कक्षा से शुरू होता है।
सरकारी विद्यालय क्यों आवश्यक हैं -
भारत में करोड़ों परिवार ऐसे हैं जिनके लिए निजी विद्यालय आर्थिक रूप से संभव नहीं हैं। सरकारी विद्यालय केवल शिक्षा नहीं देते, बल्कि सामाजिक समानता का अवसर भी प्रदान करते हैं। मध्याह्न भोजन, निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें, छात्रवृत्तियाँ और समावेशी शिक्षा जैसी योजनाएँ लाखों बच्चों को विद्यालय से जोड़े रखती हैं।
यदि सार्वजनिक शिक्षा कमजोर होगी तो शिक्षा का निजीकरण तेज़ हो सकता है। इसका सबसे अधिक प्रभाव उन परिवारों पर पड़ेगा जिनके पास निजी विद्यालयों का विकल्प नहीं है। परिणामस्वरूप सामाजिक और आर्थिक असमानता बढ़ने की आशंका रहेगी।
नीति की दिशा क्या होनी चाहिए ? -
विद्यालयों का समेकन यदि आवश्यक हो तो उसके साथ तीन शर्तें अनिवार्य होनी चाहिए—
- किसी भी बच्चे की विद्यालय तक पहुँच कठिन न हो।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षक और आधारभूत सुविधाएँ वास्तव में उपलब्ध हों।
- सीखने के परिणामों का स्वतंत्र मूल्यांकन नियमित रूप से सार्वजनिक किया जाए।
इसी प्रकार शिक्षा बजट को केवल वार्षिक व्यय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता में निवेश माना जाना चाहिए। विकसित देशों का अनुभव बताता है कि शिक्षा पर किया गया निवेश दीर्घकाल में आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता, नवाचार और लोकतांत्रिक सशक्तीकरण के रूप में कई गुना प्रतिफल देता है।
भारत के सामने विकल्प स्पष्ट है। यदि हम विकसित राष्ट्र बनना चाहते हैं तो विद्यालयों को लागत नहीं, पूँजी मानना होगा शिक्षक को कर्मचारी नहीं, राष्ट्र-निर्माता मानना होगा और शिक्षा को सरकारी योजना नहीं, राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा।
सरकारों का यह दायित्व है कि वे संसाधनों का कुशल उपयोग करें, पर उतना ही आवश्यक यह भी है कि कोई बच्चा केवल इसलिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित न रह जाए क्योंकि उसका विद्यालय दूर हो गया या सार्वजनिक शिक्षा में पर्याप्त निवेश नहीं हुआ।
विकसित भारत की यात्रा संसद भवन, उद्योगों या महानगरों से शुरू नहीं होती। वह उस छोटे से सरकारी विद्यालय से शुरू होती है जहाँ कोई बच्चा पहली बार वर्णमाला लिखता है, पहला गणितीय प्रश्न हल करता है और पहली बार यह सपना देखता है कि वह भी डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक, इंजीनियर या नीति-निर्माता बन सकता है।
यदि हम उस विद्यालय को मजबूत करेंगे, तो विकसित भारत का सपना भी मजबूत होगा। यदि हम उस विद्यालय को कमजोर होने देंगे, तो 2047 का लक्ष्य केवल आर्थिक आँकड़ों में दिखाई देगा, समाज की वास्तविक प्रगति में नहीं।