"अपनो से अपनो के बीच छिड़ी जंग की मूनादी"।। जशपुर की सियासत में इन दिनों जो हो रहा है, उसे सिर्फ सोशल मीडिया की लड़ाई कहकर नजरअंदाज करना शायद बड़ी भूल होगी।
क्योंकि यह जंग विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच नहीं है यह जंग एक ही पार्टी के दो धड़ों के बीच है।एक तरफ भाजपा का वह युवा चेहरा है जिसने 2018 से 2023 तक सोशल मीडिया पर कांग्रेस केखिलाफ मोर्चा संभाला।और दूसरी तरफ अब वही युवा नेता भाजपा के खिलाफ सोशल नैरेटिव गढ़ते नजर आ रहे हैं।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती भाजपा ने भी इस सोशल वार का जवाब देने के लिए अपनी सोशल टीम मैदान में उतार दी है।
अब सोशल मीडिया पर पोस्ट बनाम पोस्ट है नैरेटिव बनाम नैरेटिव है और आरोप बनाम पलटवार है।जिस सोशल रणनीति से कांग्रेस घिरी अब वही रणनीति BJP के खिलाफ हो गई है।2018 के विधानसभा चुनाव में जशपुर जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था।कांग्रेस ने भाजपा से जिले की तीनों सीटें छीन ली थीं।
इसके बाद भाजपा के इस युवा नेता विवेकानन्द झा ने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाया।लगातार पोस्ट, लगातार हमले, और लगातार कांग्रेस सरकार और स्थानीय कांग्रेस नेताओं को घेरने की रणनीति और देखते ही देखते सोशल मीडिया पर एक अलग तरह का नैरेटिव तैयार होने लगा।राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि 2023 के चुनाव तक झा की इस सोशल रणनीति ने कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नतीजा?2023 में जशपुर जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का सफाया हो गया।
अब वही कहानी एक नए मोड़ पर पहुंच गई है।इस बार निशाने पर कांग्रेस नहीं भाजपा है।युवा नेता झा के सोशल मीडिया हमलों के बाद भाजपा की तरफ से भी सोशल मीडिया पर जवाबी हमला शुरू हो गया है।
भाजपा की सोशल टीम का आरोप है कि यह लड़ाई विचारधारा की नहीं बल्कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा की लड़ाई है।भाजपा समर्थक सोशल मीडिया पर युवा नेता को ‘कालनेमि’ बताकर उनके खिलाफ नैरेटिव बनाने में जुटे हैं।आरोप लगाया जा रहा है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी नहीं होने के कारण अब वही चेहरा भाजपा केखिलाफ माहौल बनाने में जुट गया है।
यानी कल तक जो कांग्रेस के खिलाफ भाजपा का डिजिटल योद्धा था, आज भाजपा के लिए वही डिजिटल चुनौती बन गया है।
सवाल सिर्फ एक नेता का नहीं BJP के सोशल नैरेटिव का है।सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि भाजपा के खिलाफ सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलने की नौबत आ गई?
क्या यह वास्तव में विचारों की लड़ाई है?या फिर संगठन के भीतर राजनीतिक असंतोष सोशल मीडिया के रास्ते बाहर आ रहा है?क्या भाजपा इस सोशल नैरेटिव को रोक पाएगी?और क्या भाजपा की सोशल टीम उस युवा नेता के प्रभाव को चुनौती दे पाएगी, जिसने कभी कांग्रेस के खिलाफ इसी प्लेटफॉर्म को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया था?
जरा समझिए कि जशपुर में यह लड़ाई इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?क्योंकि जशपुर कोई सामान्य राजनीतिक जिला नहीं है।यह मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का गृहजिला है।इसलिए जशपुर में भाजपा के भीतर चलने वाला कोई भी राजनीतिक घटनाक्रम सिर्फ जिले तक सीमित नहीं रहता।
उसकी गूंज रायपुर तक सुनाई देती है और कई बार पूरे प्रदेश की राजनीति में उसका असर दिखाई देता है।यही वजह है कि इस वक्त जशपुर की यह BJP Vs BJP सोशल जंग राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।
जिस युवा नेता ने कभी कांग्रेस के खिलाफ सोशल मीडिया की ऐसी जमीन तैयार की थी कि कांग्रेस 2023 में जशपुर से साफ हो गई आज उसी जमीन पर भाजपा के खिलाफ नैरेटिव तैयार हो रहा है।और भाजपा भी खामोश बैठने के बजाय उसी सोशल मीडिया पर जवाबी हमला कर रही है।यानी,पार्टी वही है,सोशल मीडिया वही है,चेहरे वही हैं,लेकिन इस बार निशाना बदल गया है।
कल तक लड़ाई थी—
भाजपा v/s काँग्रेस की
और आज तस्वीर है BJP Vs BJP !अब देखना दिलचस्प होगा कि इस सोशल वार में जीत किसकी होती है नैरेटिव बनाने वाले युवा नेता की या फिर भाजपा की संगठित सोशल मीडिया टीम की?
क्योंकि जशपुर में यह सिर्फ सोशल मीडिया की लड़ाई नहीं यह आने वाली सियासी कहानी का ट्रेलर भी हो सकता है।