मंदसौर मुनादी।। कहते हैं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं, लेकिन इस मामले में लगता है कि कानून की नजर थोड़ी कमजोर निकली। जिस महिला को पुलिस, परिजन और पूरा सिस्टम मिलकर डेढ़ साल पहले मृत घोषित कर चुके थे, उसका अंतिम संस्कार भी कर चुके थे, उसकी हत्या के आरोप में चार लोगों को जेल भी भेज चुके थे, वही महिला अब अचानक अपने घर लौट आई है।
जी हां, कहानी किसी फिल्म की नहीं, मध्यप्रदेश के मंदसौर और झाबुआ की है, जहां डेढ़ साल पहले एक क्षत-विक्षत शव मिला। शव इतना क्षत-विक्षत था कि चेहरा पहचानना मुश्किल था, लेकिन हमारे सिस्टम का आत्मविश्वास देखिए—परिजनों ने कहा "यही हमारी बेटी है", पुलिस ने कहा "ठीक है", कोर्ट में केस पहुंच गया, चार लोग जेल चले गए और मामला लगभग सुलझा हुआ मान लिया गया।
अब असली ललिता बाई घर लौट आई हैं।
यानी जिस महिला का अंतिम संस्कार हुआ, वह कोई और थी। सवाल यह है कि वह कौन थी? उसका परिवार कौन है? उसकी हत्या किसने की? और सबसे बड़ा सवाल—अगर ललिता जिंदा थी तो जेल में बंद चार लोग किस अपराध की सजा भुगत रहे हैं?
पुलिस अब कह रही है कि "हम कड़ियां जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।"
जनता पूछ रही है कि डेढ़ साल पहले जो कड़ियां जोड़ी गई थीं, वो आखिर किस तार से जुड़ी थीं?
विडंबना देखिए, एक अज्ञात शव को ललिता मान लिया गया, हत्या का आरोप तय हो गया, गिरफ्तारी हो गई, जेल हो गई, लेकिन अब जब ललिता खुद थाने पहुंच गई है तो पूरा सिस्टम उस अज्ञात महिला की तलाश में निकल पड़ा है, जिसका अंतिम संस्कार बहुत पहले किया जा चुका है।
इस मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—
- क्या केवल परिजनों की पहचान के आधार पर शव की पुष्टि कर देना पर्याप्त था?
- डीएनए जांच क्यों नहीं कराई गई?
- अगर महिला जिंदा है तो जेल में बंद आरोपियों का क्या होगा?
- और सबसे अहम, जिस महिला की मौत हुई थी, उसे न्याय कब मिलेगा?
फिलहाल ललिता के बच्चे अपनी मां के लौटने से खुश हैं, लेकिन न्याय व्यवस्था के सामने एक असहज सवाल खड़ा है—अगर "मृतक" खुद चलकर घर लौट आए, तो फिर डेढ़ साल से चल रही पूरी कहानी में सच कौन था और गलती किसकी?
यह मामला केवल एक महिला के लौट आने की कहानी नहीं है, बल्कि उस सिस्टम का आईना भी है जो कभी-कभी निष्कर्ष तक पहुंचने की इतनी जल्दी में होता है कि सच पीछे छूट जाता है।