डॉ. नरेन्द्र पर्वत | व्याख्याता, रायगढ़
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जब हम पिछले 77 वर्षों की यात्रा की ओर देखते हैं, तो यह केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का क्षण भी है। यह वह समय है जब हमें यह पूछना चाहिए कि जिन सपनों के साथ हमारे पूर्वजों और संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्र भारत की नींव रखी थी, हम उन्हें कहाँ तक साकार कर पाए हैं—और आगे हमारा रास्ता क्या होना चाहिए।
26 जनवरी 1950 को भारत ने स्वयं को एक सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। यह केवल एक संवैधानिक घोषणा नहीं थी, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का औपचारिक रूप था।
गणतंत्र की उपलब्धियाँ
पिछले 77 वर्षों की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत की लोकतांत्रिक निरंतरता रही है। नियमित और स्वतंत्र चुनाव, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण तथा संविधान के प्रति औपचारिक निष्ठा ने भारत को अनेक नवस्वतंत्र देशों से अलग पहचान दी है। भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं के बावजूद भारत का एक राष्ट्र के रूप में सुदृढ़ बने रहना हमारी संघीय व्यवस्था की सफलता का प्रमाण है।
आर्थिक मोर्चे पर भी भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। आज भारत विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल भुगतान प्रणाली, अंतरिक्ष विज्ञान, स्टार्ट-अप संस्कृति और तकनीकी नवाचार ने वैश्विक मंच पर भारत की पहचान को सशक्त किया है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उठाए गए कई ऐतिहासिक कदमों ने वंचित वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया है।
जहाँ हम पीछे रह गए
इन उपलब्धियों के समानांतर कुछ गहरी और चिंताजनक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। सामाजिक और आर्थिक असमानता आज भी भारतीय समाज की कठोर सच्चाई है। विकास का लाभ समान रूप से सभी तक नहीं पहुँच पाया। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाएँ आज भी वर्ग, क्षेत्र और संसाधनों पर निर्भर हैं।
संवैधानिक मूल्यों के स्तर पर भी चिंताएँ बढ़ी हैं। असहमति को लोकतंत्र का अनिवार्य तत्व मानने के बजाय कई बार उसे संदेह और विरोध की दृष्टि से देखा जाने लगा है। संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर उठते प्रश्न गणतंत्र की आत्मा को कमजोर करते हैं।
राजनीति में वैचारिक विमर्श के स्थान पर भावनात्मक और विभाजनकारी मुद्दों का बढ़ता प्रभाव लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए शुभ संकेत नहीं है। नागरिकों में अधिकारों के प्रति जागरूकता तो बढ़ी है, पर कर्तव्यों के प्रति संवेदनशीलता अपेक्षाकृत कम होती दिखाई देती है।
आगे का मार्ग:
एक सशक्त गणतंत्र की ओर
भारतीय गणतंत्र को और मजबूत बनाने के लिए संविधान को केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य के रूप में अपनाना होगा। शिक्षा व्यवस्था में संवैधानिक चेतना और नागरिक शिक्षा को विशेष महत्व देना समय की आवश्यकता है।
राजनीतिक सुधार अब अपरिहार्य हो चुके हैं। चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, आपराधिक राजनीति पर कठोर नियंत्रण और राजनीतिक दलों के भीतर लोकतांत्रिक ढाँचे का सुदृढ़ीकरण गणतंत्र को नई ऊर्जा दे सकता है। विकास की अवधारणा को समावेशी बनाना होगा, जहाँ आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक न्याय भी सुनिश्चित हो।
सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जागरूक नागरिकों की है। गणतंत्र केवल सरकार से नहीं चलता, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से जीवित रहता है। सवाल पूछना, संवाद करना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना हर नागरिक का दायित्व है।
इन 77 वर्षों में भारत ने गणतंत्र की मजबूत नींव रखी है। अब आवश्यकता है उसे और ऊँचाई देने की—संविधान, संवेदना और सहभागिता के सहारे। यदि नागरिक और संस्थाएँ मिलकर अपने-अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करें, तो भारतीय गणतंत्र न केवल सुरक्षित रहेगा, बल्कि निरंतर प्रगति की दिशा में अग्रसर भी होगा।